आबादी 90 फीसदी पर शीर्ष पर कोई नहीं, बच्चों को छुरा नहीं कलम थमाने का वक्त
संविधान बदल गया तो छिन जाएगा हक, आने वाली पीढ़ियां मांगेंगी जवाब
प्रो. लक्ष्मण यादव, असि. प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय – देश का नया निजाम बहुजन समाज का हक छीनने की योजना बना रहा है. संविधान बदलने की बातें हो रही हैं. हिन्दुत्व को खतरा बताया जा रहा है. लोगों को छुरी तेज करने की सलाह दी जा रही है. वो चाहते हैं कि बहुजन समाज के लोग, जो देश की आबादी के 90 प्रतिशत हैं, मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में उलझे रहें ताकि वो हमसे हमारी शिक्षा, हमारा रोजगार, हमारा आत्मसम्मान दोबारा छीन सकें. हमें उन्हें किसी कीमत पर सफल नहीं होने देना है. बाराबंकी में नवनिर्माण युवा ब्रिगेड के तत्वावधान में आयोजित अंबेडकरवादी मंडलवादी संसद की पहल बता रही है कि हमने षड्यंत्र को भांप लिया है और उसका मुकाबला करने को तैयार हैं.
इस संसद में तमाम अलग-अलग समुदायों के लोग एक विचार के साथ आए हैं. यह एक अच्छा संकेत है. जब देश की संसद अपना काम न कर रही हो, तब अंबेडकरवादी संसद और मंडलवादी संसद को एक इतिहास रचने की जिम्मेदारी लेनी ही होगी. यह जिंदा लोगों की संसद है. डॉ राम मनोहर लोहिया भी कहा करते थे कि जब सड़कें खामोश हो जाएं तो संसद आवारा हो जाती है. बाराबंकी में आयोजित इस संसद में कई जिलों के लोग एकत्र हुए हैं. इन्होंने सड़कों को खामोशी को तोड़ा है. यह एक वैचारिक क्रांति है जो हजारों सालों से चली आ रही है. कितना भी बुरा वक्त आ जाए, कितने भी मुकदमे हो जाएं, इस आवाज को दबाया नहीं जा सकता. यह विचार डॉ अंबेडकर, डॉ राम मनोहर लोहिया, जगजीवन राम और रामस्वरूप वर्मा का विचार है. भारत को बनाने वाले हमारे पुरखे थे. भारत को बचाने का काम हमें करना है.
इस देश में कभी किसी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ने अपनी जाति नहीं बताई. 2013 तक किसे पता था कि गुजरात का मुख्यमंत्री किस जाति का है. पर जब प्रधानमंत्री बनने की बात आई तो बिना पूछे ही देश को बताया जाता रहा कि वे ओबीसी समुदाय से आते हैं. राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री वह किसी जाति का नहीं होता. वह सबका होता है. तो फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राष्ट्रपति की जाति बताने वाले लोग कौन थे? उनकी क्या मंशा थी? दिल्ली में बड़े-बड़े होर्डिंग लगते हैं कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के इतने-इतने लोगों को मंत्री बना दिया. कभी वो हमे हिन्दू बताते हैं, कभी हमारी जाति ब बताते हैं.
मैं उत्तर प्रदेश में हूँ, विश्वविद्यालय में पढ़ाता हूँ. बहुत ज्यादा बोलने पर यहां केस मुकदमा हो जाएगा. हम गांव में गाय भैंस चराते थे. घरवालों ने हिम्मत करके इलाहाबाद यूनिवर्सिटी भेज दिया. हमने विश्वविद्यालय टॉप किया जो प्रोफ़ेसर कहने लगे कि गाय भैंस चराने वाले यूनिवर्सिटी टॉप करेंगे तो हमारे बच्चे कहां जाएंगे. तब मुझे पता चला तो मैं ओबीसी हूं. कुछ लोगों को बहुत बाद में पता चला तो उन्होंने गंगाजल से घर धुलवाया. हममें से ज्यादातर लोगों को इसका अनुभव कभी न कभी तो हुआ होगा.
उत्तर प्रदेश में अभी रामचरित मानस की चौपाइयों पर विवाद चल रहा है. मेरी तो पीएचडी ही तुलसीदास पर हैं. हमारे पुरखे कुदाल, फावड़ा लेकर श्रम करते थे. पर हमारे हाथों में कलम और किताब है. अभी तो एक लंबा हिसाब बाकी है. हम तो सवाल पूछेंगे. हमें किसी व्याख्या की जरूरत नहीं. हमने देखा है कि कोई मूंछ रखने पर, कोई मटका छू देने पर, कोई घोड़ी चढ़ जाने पर तो कोई अपने हक की बात करने पर मारा जा रहा है. आखिर किस जाति के लिए लिखा गया है – जे पर नाथन तेल तुम्हारा सुप्तकरात कोल कलवारा? क्यों कह दिया- पूजहि विप्र सकल गुण हीना। शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।. तब संत कबीर और संत गुरु रविदास ने कहा पुजिए चरण चांडाल के जो होवे गुण प्रवीण. यह एक वैचारिक पंक्ति है कहती है प्रतिभा और काबिलियत का सम्मान हो.
उत्तर प्रदेश के लोगों को अच्छे से पता होगा कि अंबेडकरवादी और मंडलवादी विचारधारा में अंतर क्या है. कोई बड़ा नहीं कोई छोटा नहीं. बचपन में हम देखते थे कि बुलडोजर जमीन को समतल करते हैं. आजकल बुलडोजर लोगों का घर रौंद रहा है. उसमें लोग भी मर रहे हैं. आज से 15 साल पहले तकरीबन 15 लोग सरकारी नौकरी में थे. कांवर ढोने कोई नहीं जाता था. आज 15-20 लोग कांवर ढोने जाते हैं और सरकारी नौकरी वाला कोई नहीं बचा. अब कांवड़ यात्रियों पर हेलीकाप्टर से फूल बरसाया जाता है.
पहले गांव में भैंसचोर आते थे. एक आदमी भैंस की गले का घंटा लेकर पूरब की ओर भागता था तो शेष लोग भैंस लेकर पश्चिम की ओर चल पड़ते थे. पूरा गांव घंटा के आवाज के पीछे दौड़ता था. फिर चोर घंटा किसी खेत में फेंककर चला जाता था. लोगों के हाथ लगता था घंटा और भैंस चोरी हो जाती थी. घंटा के पीछे भागोगे तो कुछ नहीं मिलेगा. हमारी शिक्षा, हमारा रोजगार, हमारा सम्मान, उसकी चोरी हो रही है और हम घंटी के पीछे भाग रहे हैं.
इस देश में मुकदमा उनके ऊपर नहीं होगा जो कहेंगे चाकू तेज कर के घर में रखना होगा, क्योंकि हमारा धर्म खतरे में है. कुछ लोग फकीर बन गए हैं तो कोई जुबान काटने और गर्दन काटने पर ईनाम की घोषणा कर रहे हैं. कबीर ने कहा है – संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत। चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत। मूल बात यह है कि जिस दिन मंदिर जाने वाली भीड़ स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय जाने लगेगी उस दिन भारत को विश्व गुरु बनने से कोई नहीं रोक पायेगा.
नई शिक्षा नीति 2020 इस देश में लागू हो चुकी है. नई शिक्षा नीति कह रही है कि जिस स्कूल में 3000 से कम विद्यार्थी होंगे उसे दूसरे स्कूल में मर्ज कर देंगे. दोनों मिलाकर भी विद्यार्थी पूरे नहीं हुए तो स्कूलों को बंद कर देंगे. जिस डिग्री कॉलेज में 5000 से कम विद्यार्थी होगा उसे भी बंद कर दिया जाएगा. 45000 हजार सरकारी डिग्री कॉलेज है उनको कम करके क्लोजर और मर्जर के जरिए 15000 कर दिया जाएगा. आपने जिनको वोट दिया वह कह रहे हैं कि अब स्कूल कॉलेज बंद होंगे. हर जगह ठेके पर प्रोफेसर होंगे. मैं खुद एक ठेके पर प्रोफेसर हूं.
चतुर राजनीतिज्ञों ने लोगों में सांप्रदायिकता की आग भर दी है. केवल लड़ते रहो मंदिर-मस्जिद के नाम पर लड़ते रहो. हमारे बच्चों की शिक्षा बिक चुकी. रोजगार खत्म हो गया. सम्मान स्वाभिमान भी खत्म हो रहा है. लोग कहते हैं कि डॉ भीमराव अंबेडकर पर अहसान कर दिया कि उन्हें संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बना दिया. अरे भाई 18 डिग्री, 4 पीएचडी वाला उस समय भारत में कोई दूसरा आदमी था ही नहीं. बाबा साहेब ने अपनी काबिलियत और हुनर से यह मुकाम पाया था. उन्होंने एक ऐसा संविधान बनाया जिसमें कोई बड़ा नहीं कोई छोटा नहीं.
लोग हमें जातिवादी कहते हैं. फिर बताएं कि दिल्ली विश्वविद्यालय के 92 डिग्री कॉलेज में एक भी एस, एसटी या ओबीसी का कुलपति या प्रिंसिपल नहीं बना. आज तक सुप्रीम कोर्ट में केवल 2 एससी और एक ओबीसी जज नियुक्त हुआ है. एसटी का कोई भी आदमी आज तक सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नहीं बन पाया.
इस देश में अनुसूचित जाति के लोगों ने सबसे ज्यादा अपमान सहा है. जब उन्हें एक वैचारिक ऑईकान मिला तो उन्होंने पूरी दुनिया को बता दिया कि बाबा अंबेडकर कौन है. अब उसे कोई मिटा नहीं सकता. ये ताकत है उस वैचारिक आंदोलन की जिसने कांशीराम को आजाद भारत में आंदोलन के लिए प्रेरित किया. अब ये तीसरा दौर है. ओबीसी समाज के लोगों से मेरी गुजारिश है केवल इतनी है कि हमें भड़काया जायेगा, तोड़ा जायेगा. हमे आपस में कहा जायेगा कि हमारा हक को किसी ने मार लिया. इस जाति का हक उस जाति के लोगों ने मार लिया. हमें आपस में लड़ाया जायेगा. कभी आपने देखा उन तमाम शोषक जातियों को आपस में लड़ते हुए. उनमें तालमेल है. समय असमय एक दूसरे की मदद करते हैं.
आपकी जाति के लोगों का वे मुखौटे की तरह इस्तेमाल करते हैं. दूसरी तरफ आपको सांप्रदायिकता में झोंका जा रहा है. आजकल कथा भागवत की बाढ़ आई है. नए-नए बाबा आ गए हैं जो किस्मत बता रहे हैं. टीवी पर बैठकर लोग यह कह रहे हैं कि चमत्कार है, ज्ञान है. यह दूसरों की किस्मत बताने वाले लोग केवल आपका ध्यान भटका रहे हैं. वैचारिक लोगों को इस क्रांति की आग को बुझने नहीं देना है.
यह लड़ाई सदियों से चली आ रही है. कबीर, रैदास, बाबा फरीद, महात्मा फुले, डॉ भीमराव अंबेडकर, डॉ राम मनोहर लोहिया, मंडल, कांशीराम की लड़ाई भारत की राष्ट्र निर्माण की लड़ाई है. हमें सबकुछ झोंककर भी लड़ना पड़े तो भी इस कारवां को रुकने नहीं देना है. ढपोर शंखों से बच कर रहना है.
क्या ऐसे बनेंगे विश्व गुरू?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 ए कहा गया है आप वैज्ञानिक चेतना का विस्तार करें. एक तरफ स्कूल कालेज में पढ़ा रहे हैं कि सूरज का आकार और तापमान इतना है और उधर कथावाचक बता रहा है कि कोई सूरज को निगल गया. मंगल ग्रह को तो पता ही नहीं कि उसके नाम पर यहां कितनी शादियां टूट रही हैं. हमें शिक्षा और रोजगार का हक चाहिए. बच्चों के हाथ में चाकू नहीं तेज कलम की जरूरत है. हमारी लड़ाई कलम और किताब की लड़ाई है. पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया.
ओबीसी समाज एकजुट हो
देश की आबादी का 90 प्रतिशत ओबीसी समाज में आता है. थोड़ी एकजुटता बनानी होगी. जिन जातियों की जनसंख्या ज्यादा है उनको अपनी नाक थोड़ी छोटी और दिल बड़ा करना होगा. हमारी लंबी नाक एकजुटता के आड़े आती है. हम आपस में लड़ेंगे तो ठग हमारा वोट ले जाएंगे. यहां सवाल आपके बच्चों के भविष्य का है. बच्चों को संप्रदायिक दंगों में झोंके जाने से बचाना होगा. मुल्क के 90% लोग तय कर लें कि हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में हम नहीं जाएंगे तो यह मुद्दा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा.
पीढ़ियों को देना होगा जवाब
हमारी आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि आपको भारत के संविधान का लाभ मिला. सरकारी शिक्षा मिली. सरकारी रोजगार मिला. कोई तुम्हारे सामने आकर कहे कि भारत के संविधान को बदलना है, हिंदू राष्ट्र बनाना है तो आप चुप क्यों रहे. वही लाभ अब हमें क्यों नहीं मिल रहा? तब हमें जवाब तो देना होगा. इसलिए कुछ ऐसा करें कि आने वाली पीढ़ियों की आंख में आंख मिलाकर कह सकें कि मैंने अपने हिस्से की लड़ाई लड़ी. आने वाली पीढ़ियां हम पर नाज करेंगी, अफसोस नहीं.
