दुर्ग : वैसे तो पूरे देश में देवी दुर्गा की कई प्रसिद्ध और रहस्यमयी शक्तिपीठ (मंदिर) हैं जो अपनी अलग-अलग कहानियों, मान्यताओं और किवंदतियों की वजह से मशहूर है. देवी दुर्गा का एक मंदिर छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में भी स्थित है जिसे लोग देवी चंडी मंदिर के नाम से जानते हैं. आदि शक्ति मां चंडी की पूजा और दर्शन के लिए दुर्ग शहर ही नहीं, बल्कि दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आते हैं. इस मंदिर की अपनी अलग ही महिमा है, लोगों की मान्यता है कि माता के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता. अपनी मनोकामना को लेकर हर साल दोनों नवरात्र पर्व में मनोकामना ज्योत प्रज्वलित कराते हैं.
वर्तमान में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया. निर्माण के लिए राजस्थान से लाल और पीले रंग के पत्थर लाए गए थे. इससे मंदिर और प्रवेश द्वार को भव्य आकार दिया गया है. वहीं गर्भगृह की दीवारों पर देवी-देवताओं की आकृति मनमोहक ढंग से उकेरी जा रही है. मां के आंगन में हर आम और खास लोगों की आस्था है. यहां देश-विदेश से लोग ज्योत जलवाते हैं. वर्तमान में यहां विदेश के 10 ज्योत प्रज्वलित हैं.
मंदिर का इतिहास
दुर्ग के मां चंडी मंदिर का इतिहास दुर्ग जिला गठन से भी पहले का है. दुर्ग जिले का गठन 1906 में हुआ. मां चंडी मंदिर का इतिहास करीब 250 वर्ष पुराना है. मंदिर में कभी न सुखने वाला एक कुंड है, जिसमें बारहमास जल भरा रहता है. यह कुंड ही मंदिर के प्राचीनतम होने का प्रमाण है. साथ ही यहां भैरव जी की प्राचीन प्रतिमा, मां दुर्गा, मां चंडी, मां अन्नपूर्णा और भगवान श्रीगणेश जी की नवीनतम प्रतिमाएं भी विराजित हैं.
पहले सिर्फ कुंड था
शहर के जानकार बताते हैं कि मंदिर का जो स्वरूप वर्तमान में नजर आ रहा है वैसा नहीं था. पहले सिर्फ कुंड हुआ करता था. ऐसी मान्यता है कि कुंड का पानी कभी नहीं सूखता था. वर्तमान में कुंड का आकार छोटा हो गया है. कुंड के ऊपर टिन शेड लगा हुआ था. पुराने जमाने में लोग कुंड में ही जल चढ़ाकर पूजा-अर्चना करते थे. बताते हैं कि कुंड का आकार योनिस्वरूपा है. पूरे देश में कामाख्या मंदिर के बाद एकमात्र यह मंदिर योनिस्वरूपा मंदिर है. कुछ लोग बताते हैं कि देवी चंडी की छोटी बहन का मंदिर महाराष्ट्र के आमगांव में स्थित है.
एक मान्यता यह भी
लोग बताते हैं कि यह मंदिर आदिवासी राजाओं के जमाने का है. शहर के अंतिम छोर में स्थित होने के कारण लोग सिर्फ दिन में ही पूजा-अर्चना करते थे. रात में अंधेरा होने के कारण लोग वहां जाने से डरते थे. धीरे-धीरे कुंड की प्रसिद्धि फैलने और आस्था बढ़ने पर देवी की प्रतिमा स्थापित की गई. प्रतिमा स्थापना के बाद आज से छह दशक पहले शहर के एक श्रद्धालु डेरहा राम यादव ने मंदिर निर्माण के लिए 50 हजार रुपए दान दिया था. मंदिर निर्माण में उनके बड़े योगदान को देखते हुए फिर ट्रस्ट का गठन हुआ. वर्तमान में मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित है.
1975-76 से ज्योति कलश प्रज्ज्वलन की शुरुआत
इस मंदिर में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलन की शुरुआत 1975-76 में हुई है. इसके पहले सिर्फ एक ज्योतिकलश दोनों नवरात्रि में प्रज्ज्वलित की जाती थी. ज्योति कलश की शुरुआत आचार्य स्व. अभयराम द्विवेदी के मार्गदर्शन में हुआ था. वर्तमान में ज्योतिकलश की संख्या हजारों में पहुंच गई है. प्रतिवर्ष यहां 2500 के आसपास ज्योत जलाए जाते हैं. चैत्र और क्वांर नवरात्रि पर देश ही नहीं बल्कि विदेशों में बसे देवी के भक्त मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करवाते हैं.
ऐसे पहुंचे मंदिर
मां चंडी मंदिर पहुंचने के लिए दुर्ग मेन रोड पर स्थित पटेल चौक से तहसील कार्यालय, शनिचरी बाजार होते हुए पहुंच सकते हैं. मुख्य मार्ग से मंदिर की दूरी करीब एक किलोमीटर है. इसके अलावा पोलसाय पारा चौक से भी पहुंचा जा सकता है. दुर्ग रेलवे स्टेशन से इस मंदिर की दूरी करीब दो किलोमीटर है. स्टेशन से पोलसाय पारा, लुचकी पारा चौक होते हुए मंदिर पहुंचा जा सकता है.
