छत्तीसगढ़ राज्य बना जरूर लेकिन नौकरशाही और अफसरशाही के भ्रष्ट तंत्र ने प्रदेश को दीमक की तरह कुतरकर खोखला कर दिया है. इस खोखलेपन की पड़ताल पहली बार भूपेश सरकार के कार्यकाल में हुई जो साहस डॉ.रमन सिंह अपने मुख्यमंत्रित्व के पंद्रह वर्षीय कार्यकाल में नहीं दिखा सके वो साहस कांग्रेस शासन काल के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दिखाया और भ्रष्ट नौकरशाही को निलंबित और बर्खास्त कर बाहर का रास्ता दिखाया है. भूपेश की इस कार्रवाई से भ्रष्ट नौकरशाही और अफसरशाही में कड़ा संदेश गया है. चर्चा ये है कि अभी तो ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है.
अंतिम पंक्ति के आम आदमी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समृद्ध एवं स्वावलंबी बनाने के लिए सर्वोत्तम और सराहनीय योजना, नरवा, गरूवा, घुरवा और बारी से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आए व्यापक बदलाव को सहज ही देखा जा सकता है. वर्तमान समय में और इससे पहले कोरोना महामारी की आपात स्थिति में भी छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था और जनजीवन काफी हद तक सामान्य रहा, इसके पीछे नरवा, गरूवा, घुरवा, बारी योजना के माध्यम से अत्यंत पिछड़े एवं गरीब तबकों तक पहुंच बना चुकी आर्थिक आय ही प्रमुख कारण रही है. इस योजना ने गोबर बीनने वाले को भी समृद्ध और स्वावलंबी बनाया है. गांव में पशुधन की वृद्धि और खेती को लाभकारी बनाने वाली इन योजनाओं से मजदूर और किसान वर्ग को लाभ तो मिला है, लेकिन क्या मुख्यमंत्री और उनकी सरकार की मंशा के अनुरूप सफलता मिली है? यक्ष प्रश्न यह भी है कि नौकरशाही की सामंती सोच और भ्रष्टाचार के चलते जनकल्याणकारी योजनाओं पर ग्रहण क्यों लग रहा है?
मुख्यमंत्री के अतिरिक्त पंचायत स्तर से लेकर जिला और प्रदेश स्तर पर प्रतिनिधित्व करने वाले तमाम जनप्रतिनिधियों की ओर से जनकल्याणकारी योजनाओं को शत-प्रतिशत सफल बनाने तथा हितग्राहियों को उचित लाभ पहुंचाने के लिए कितने प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों की तरह स्थानीय जनप्रतिनिधि भी क्यों उदासीन और लापरवाह हैं, यह शोध का विषय है. वास्तविकता यह है कि अधिकतर क्षेत्रों में उदासीनता और लापरवाही का आलम है. जाहिर है कि विघ्न संतोषी तत्व और विपक्षी दल के लोग इस स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश करेंगे. जहां तक नौकरशाही का सवाल है उसे जनसमर्थन से कोई सरोकार नहीं है, क्योंकि उन्हें निर्वाचन में नहीं जाना है. जनसरोकार से दूर नौकरशाह आज भी अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित नहीं है क्योंकि वे जन परीक्षा से मुक्त हैं और जनप्रतिनिधि भी ऐसे नौकरशाहों पर लगाम कसने में असफल साबित हो रहे हैं. सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद सरकारी कार्यों में भ्रष्टाचार, ठेकेदारों की मनमानी और पुलिस, पटवारी से लेकर उच्च स्तर तक आम आदमी और विकास कार्य लालफीताशाही के शिकार हैं. गत वर्ष विभिन्न सड़कों के सुधार, उन्नयन एवं निर्माण का लक्ष्य लेकर राज्य सरकार ने 5000 करोड़ की राशि स्वीकृत की थी, लेकिन लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों और उनके चहेते ठेकेदारों ने इसमें पलीता ही लगाया है. नवनिर्मित सड़कें कुछ महीने में ही उखड़ जाती हैं, नदी-नाले पर बनाए जाने वाले पुल-पुलिया बार-बार धराशायी हो जाते हैं और घूसखोर अधिकारी-कर्मचारी कुछ समय बाद ही पुनः उसी कुर्सी पर बहाल हो जाते हैं, यह स्थिति अत्यंत चिंतनीय है. अभी हाल ही में बिलासपुर का एक आरक्षक कई बेरोजगारों को पुलिस में नौकरी दिलाने का झांसा देकर लगभग डेढ़ करोड़ रुपए वसूलने के आरोप में गिरफ्तार हुआ है. जानकारी मिली है कि इससे पहले भी एक बार ऐसे ही कारनामों के लिए उसे निलंबित और दंडित किया जा चुका है. प्रश्न यह उठता है कि ऐसे लोगों की सेवा में वापसी कैसे और क्यों हो रही है?
प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए कदम तो अवश्य उठाए हैं. पुलिस विभाग में ही एक एडीजी स्तर के अधिकारी को जबरिया सेवा निवृत्ति दी गई. ये अधिकारी जेल जा चुका है और वर्तमान में भी उसके खिलाफ कई मामले विचारधीन है. एक अन्य आईपीएस अधिकारी अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं और मुंह छुपाने के लिए प्रदेश छोड़कर दिल्ली को अपना निवास बना चुके हैं. छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद इन अधिकारियों की तूती बोलती थी. इनकी मनमानी और काले कारनामों से न केवल आम नागरिक बल्कि पुलिस विभाग के भी कर्मठ और ईमानदार कर्मचारी अधिकारी परेशान थे, यहां तक कि जिला पुलिस अधीक्षक स्तर के एक युवा अधिकारी ने प्रताड़ित होकर आत्महत्या कर ली थी लेकिन पूर्ववर्ती सरकार के संरक्षण में इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी का बालबांका भी नहीं हुआ.
भूपेश बघेल के नेतृत्व में जैसी कि जनापेक्षा थी मुख्यमंत्री ने ऐसे भ्रष्ट तत्वों पर न केवल नकेल कसा बल्कि उन्हें दंडित करने की भी कार्रवाई की. वरिष्ठ सचिव स्तर के एक आईएएस अधिकारी जिन्होंने सैकड़ों अबोध ग्रामीणों के नाम बैंक खाता खोलकर करोड़ों की हेरा फेरी की थी, उनके काले कारनामों का भांडाफोड़ हुआ और वे जेल भी गए. निलंबन और बर्खास्तगी की कार्रवाई भी हुई, लेकिन कैट के माध्यम से इस अधिकारी ने अपनी वापसी कराने में सफलता पाई. कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि जब तक वर्तमान व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं होगा, नियम कानून बदले नहीं जाएंगे और सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों के निलंबन, स्थानांतरण एवं बर्खास्तगी के संबंध में न्यायालयीन हस्तक्षेप कम और ढीले नहीं किए जाएंगे, तब तक नौकरशाही को नियंत्रित कर पाना बहुत कठिन रहेगा. तमाम चुनौतियों, कठिनाइयों और दबावों के बावजूद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने साहस और निष्पक्षता के साथ भ्रष्ट नौकरशाहों को सबक सिखाने और व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं, उसकी सरहाना की जानी चाहिए.
यद्यपि वर्तमान में भी तमाम आईएएस, आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ जांच कार्रवाई चल रही है. कुछ प्रशासनिक अधिकारी जेल में भी हैं, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में अपेक्षित सुधार हुआ हो ऐसा नहीं कहा जा सकता. अभी ताजा मामला शिक्षा विभाग का है जहां हजारों शिक्षकों के स्थानांतरण और पदोन्नति में अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर आर्थिक वसूली कर शासकीय निर्देशों की अवहेलना करते हुए मनमानी तौर पर पदोन्नति और स्थानांतरण को अंजाम दिया है. इस मामले के उजागर होते ही मुख्यमंत्री के निर्देश पर दर्जन भर से अधिक भ्रष्ट अधिकारी निलंबित किए जा चुके है. मामले की उच्च स्तरीय जांच की जा रही है और पीड़ित शिक्षकों को न्याय देने की कार्रवाई भी जारी है. इस मामले से यह स्पष्ट है कि सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार और अधिकारियों की मनमानी किस स्तर तक व्याप्त है. जाहिर है कि “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता”. सभी जनप्रतिनिधियों एवं जिम्मेदार लोगों को मुख्यमंत्री की तर्ज पर निर्भीकता पूर्वक अपनी जवाबदेही का निर्वाह करते हुए जनहित एवं प्रशासनिक कसावट के लिए कड़े कदम उठाने होंगे. प्रदेश की उन्नति और जन विकास के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी का निर्वाह आवश्यक है. प्रदेश सरकार ने छत्तीसगढ़ के विकास और सरकारी योजनाओं का लाभ सबसे पिछड़े और दुर्बल जनों तक पहुंचाने के लिए तमाम लाभकारी योजनाएं लागू की है, इन योजनाओं की सफलता के लिए हर जागरूक नागरिक और खासकर जनप्रतिनिधियों को पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निरंतर जागरूक और सक्रिय रहना होगा, तभी मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप छत्तीसगढ़ के नवनिर्माण और उत्थान में सफलता मिलेगी.
