शीतला अष्टमी को बसोड़ा भी कहा जाता है. हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी का व्रत रखते हैं और शीतला माता की पूजा विधिपूर्वक करते हैं. शीतला अष्टमी के व्रत वाले दिन चूल्हा नहीं जलाने की परंपरा है. इस दिन बासी भोजन प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं. इनको ठंडा यानी शीतल भोजन अत्यंत प्रिय है, यही कारण है कि माता का भोग एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि को तैयार कर लिया जाता है. पूजा के साथ व्रत में कथा पढ़ने का बहुत महत्व है.

इस साल शीतला अष्टमी का व्रत 15 मार्च दिन बुधवार को है. शीतला अष्टमी पर सिद्धि योग बन रहा है. इसके साथ ही शीतला अष्टमी की पूजा के लिए करीब 12 घंटे का शुभ मुहूर्त प्राप्त हो रहा है.
शीतला अष्टमी 2023 पूजा मुहूर्त
15 मार्च को शीतला अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06 बजकर 31 मिनट से प्रारंभ हो रहा है, जो शाम को 06 बजकर 29 मिनट तक है. इस प्रकार से देखा जाए तो शीतला अष्टमी के दिन पूजा के लिए 12 घंटे का शुभ मुहूर्त है. शीतला अष्टमी व्रत के दिन सुबह से ही सिद्धि योग बना हुआ है. शीतला अष्टमी को प्रात:काल से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक सिद्धि योग है. पूजा पाठ या शुभ कार्यों के लिए सिद्धि योग को अच्छा माना जाता है. यह एक शुभ योग है. इस दिन ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र है.
पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार पार्वती स्वरूपा देवी शीतला माता की पृथ्वी पर भ्रमण करने की इच्छा हुई उन्होंने विचार किया कि इस चराचर जगत में उनकी पूजा कौन करता है, कौन उन्हें मानता है? शीतला माता बुढ़िया का रूप धारण कर धरती पर राजस्थान के डूंगरी गांव पहुंची और देखा कि आस-पास उनका कोई मंदिर नहीं है और न ही कोई उनकी पूजा करता है. माता शीतला गांव की गलियों में घूम रही थीं कि तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) नीचे फेंका. उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में फफोले (छाले) पड़ गए. शीतला माता के पूरे शरीर में ताप होने लगा. शीतला माता चिल्लाने लगीं, “अरे मैं जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा है, कोई मेरी मदद करो”. लेकिन उस गांव में किसी ने भी शीतला माता की मदद नहीं करने आया.
एक कुम्हारन (महिला) अपने घर के बाहर बैठी थी. उसने देखा कि बूढ़ी काफी जल गई है. महिला ने बूढ़ी माई पर खूब ठंडा पानी डाला और बोली, ‘हे मां, मेरे घर में रात की बनी हुई राबड़ी रखी है और थोड़ा दही भी है. तू दही-राबड़ी खा ले.’ बूढ़ी माई ने ठंडी (ज्वार) के आटे की राबड़ी और दही खाया तो शरीर को ठंडक मिली. महिला की नजर उस बूढ़ी माई के सिर के पीछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आंख बालों के अंदर छुपी है. यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी. इसी दौरान उस बूढ़ी माई ने कहा, रुक जा बेटी, तू डर मत. मैं कोई भूत-प्रेत नहीं हूं. मैं शीतलादेवी हूं. मैं तो इस धरती पर यह देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है? कौन मेरी पूजा करता है? इतना कह कर माता चार भुजा वाली हीरे-जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्ण मुकुट धारण किए अपने असली रूप में प्रकट हो गईं.
माता के दर्शन कर महिला सोचने लगी कि अब मैं गरीब इस माता को कहां पर बैठाऊं? उसने देवी से कहा कि मेरे घर में तो आपको बैठाने तक का स्थान नहीं है, आपकी सेवा कैसे करूं? शीतला माता प्रसन्न होकर उस महिला के घर में खड़े गधे पर बैठ गईं. उन्होंने एक हाथ में झाडू तथा दूसरे हाथ में डलिया लेकर महिला के घर की दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेंक दिया, साथ ही महिला से वरदान मांगने को कहा. महिला ने हाथ जोड़कर कहा, माता, मेरी इच्छा है कि अब आप इसी (डूंगरी) गांव में स्थापित होकर रहो. होली के बाद की अष्टमी को जो भी भक्तिभाव से पूजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाए, उसके घर की दरिद्रता को दूर करो.
शीतला माता ने महिला को सभी वरदान दे दिए और आशीर्वाद दिया कि इस धरती पर उनकी पूजा का अधिकार सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा. उसी दिन से डूंगरी गांव में शीतला माता स्थापित हो गईं और उस गांव का नाम हो गया शील की डूंगरी. शीतला माता अपने नाम की तरह ही शीतल है, वो अपने भक्तों पर खूब कृपा करती हैं.
शीतला अष्टमी व्रत का महत्व
शीतला अष्टमी के दिन व्रत रखकर शीतला माता की पूजा करते हैं. शीतला माता को सप्तमी के दिन बनाए गए पकवान का भोग लगाया जाता है. अष्टमी के दिन चूल्हा को शांत रखते हैं. इस व्रत में बासी भोजन या पकवानों का भोग लगाया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला अष्टमी व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को उत्तम सेहत का आशीर्वाद मिलता है. उसे चेचक, छोटी माता आदि जैसी बीमारी नहीं होती है. वह सेहतमंद रहता है.
