हेल्पलाइंस का टालमटोल रवैया और संस्थाओं की बेरुखी
भिलाई- खुदगर्जी और कमतर होते जा रहे बदलते दौर में भलाई के नाम से देश-दुनिया में जाने-जाने वाले भिलाई की जमीनी हकीकत कैसी है, इसकी ताजा-तरीन मिसाल बीएसपी टॉउनशिप के एक व्यस्ततम मार्केट में नाली में गिरने के बाद घायल और अपाहिज होने पर पिछले चार दिन से इलाज के अभाव में दम तोड़ने वाला सांड है. यह घटना महज एक बेजुबान जानवर की नहीं बल्कि संवेदनहीन होते समाज और आवारा मावेशियों के इलाज-देखभाल और व्यवस्था के सिस्टम की दारूण दास्तान है.
घटना के मुताबिक, 7 सितंबर को करीब रात 10 बजे भिलाई के सेक्टर-6 बी मार्केट की एक संकारी और गहरी नाली में अंधेरे में अचानक एक आवारा सांड गिर गया था. वह रातभर दर्द से तड़पते बाहर निकलने का प्रयास करता रहा लेकिन सफल नहीं हो सका. सुबह 10 बजे तक यानी 12 घंटे तक व्यस्ततम बाजार और सड़क के किनारे नाली में फंसे बेसहारा सांड की मदद के लिए किसी की संवदेना नहीं पसीजी. 11 बजे मार्केट के कुछ व्यवसायियों ने मदद के लिए डॉयल 112, बीएसपी पीएचडी और 2 गौ-शालाओं को फोन किया. इस दौरान दोपहर 1 बजे पहुंचे पुलिस के जवानों ने मार्केट के अरुण जैन, विनीता जैन और एक-दो व्यवसायियों की मदद से सांड को नाली से बाहर निकाला. लेकिन रातभर नाली में फंसे रहने से सांड का एक पैर फैक्चर होने के साथ वह आंशिक रूप से चोटिल भी हो गया था. इस कारण उसे नाली के किनारे ही छोड़ दिया गया.
8 सितंबर को कुछ व्यवसायियों ने फिर से उक्त जिम्मेदार एजेसियों को सांड के इलाज के लिए फोन किया लेकिन कोई मदद नहीं मिली और आवाजाही करने वाले और मार्केट व सेक्टर के अधिकांश लोग भी उदासीन बने रहे. इस दौरान मार्केट के एक सहृदयीश्री मौर्य, विनित जैन, अरुण जैन, गोल्डी छाबड़ा, नीरज, भारती जैन द्वारा अपने परिचित वेटेनरी डॉक्टर से आग्रह करने पर वे रात करीब 11 बजे अपने सहायक के साथ मौके पर पहुंचे. सेवाभावी डॉक्टर ने जैन दंपत्ती और एक राहगीर की मदद से अथक परिश्रम करते हुए घायल सांड को ग्लूकोज बॉटल और इंजेक्श्न आदि लगाने के साथ उसे पलट कर खड़े करने का प्रयास किया. लेकिन सांड के एक पैर टूट जाने और चोटिल होने के कारण वह खड़ा नहीं हो सका. 9 सितंबर को मार्केट के दो-चार लोग जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं, बीमार और अपाहिज सांड को खाना-पानी आदि खिलाते-पिलाते रहे. इस बीच सांड कुछ दूर घिसटकर दिनभर सड़क पर दर्द से पड़ा कराहता रहा और लोगों का आना-जाना और व्यवस्ततम दिनचर्या चलती रही.
जिम्मेदार एजेसियों पर सवाल
आवारा मवेशियों के इलाज, देखभाल और रहवास के लिए सरकार की कई योजनाएं हैं और करोड़ों रूपए इस पर खर्च किए जाते हैं. भिलाई में बीएसपी के नगर सेवाएं विभाग (PHD) और नगर निगम भिलाई आवारा मवेशियों के धर-पकड़ अभियान के तहत आए दिन मवेशियों को सड़क से पकड़कर सुरक्षित जगह छोड़ने का प्रचार भी करते हैं. वहीं गौसेवा का दंभ भरने वाले गौशालाएं और गौरक्षक भी सेवा का दावा करते रहते हैं. इतना ही नहीं कई लोग और शहर की बहुतेरी समाजसेवी संस्थाएं भी सेवा और परोपकार की बात और प्रचार कर इस मामले में उदासीन लोगों पर कटाक्ष करने से बाज नहीं आते.
हम यहां यह सब इतने विस्तार से इसलिए बता रहें है कि पिछले 4 दिन से एक बेसहारा और बीमार सांड तड़पता रहा. 10 सितंबर को भी इस बदनसीब सांड की मदद के लिए इतने बड़े सेक्टर-6, सड़क से गुजरने वाले सैकड़ों लोग व मार्केट के अधिकतर लोग हमने नहीं देखा-हमने नहीं सुना की तर्ज पर संवेदनहीन बने रहे. सिर्फ चंद लोग ही इलाज के लिए संबंधित एजेसियों को टेलीफोनिक सूचना देकर आग्रह करते रहे. 10 सितंबर को सुबह 11 बजे अरूण जैन ने राज्य शासन के हेल्पलाइन नंबर 1076 को सड़क पर तड़पते घायल सांड का वीडियो/फुटेज भेजकर मदद के लिए सूचना दी तो फोन ट्रांसफर करने की बात कही गई. लेकिन इंटरकाम ट्रांसफर के बाद जवाब में बताया गया कि यह नंबर महाराष्ट्र होने के कारण हम दूसरे राज्य छत्तीसगढ़ को मदद नहीं कर सकते.
इस दौरान शहर के गौशाला में भी सांड को ले जाकर इलाज कराने के लिए फोन किया गया तो हमारे पास वाहन नहीं है, आप यदि गाड़ी करके भिजवा दे तो अच्छा होता कहा गया.
शाम को 6 बजे तक कोशिश करने की भी बात कही गई. वहीं मार्केट के व्यवसायी विमल जैन और उनके पुत्र गौरव जैन द्वारा आवारा मावेशियों को सुरक्षित ले जाने के लिए केंद्र सरकार बहुचर्चित हेल्पलाइन नंबर 1962 पर जब फोन किया गया तो जवाब में कहा गया कि हमारे पास कोई वाहन नहीं है और हम सिर्फ सेंटर के मावेशियों का ही इलाज करते हैं. कुल मिलाकर व्यवस्था की बदइंताजामी की कहानी यह कि 10 सितंबर शाम 7 बजे तक पिछले 4 दिन से सड़क पड़े घायल और अपाहिज मरणासन्न सांड को मार्केट के चंद संवेदनशील लोगों को छोड़कर किसी भी सक्षम,सबल लोगों की मदद नहीं मिल सकी. इनमें नगर निगम और बीएसपी नगर सेवाए विभाग और गौशालाएं-गौरक्षक भी शामिल है. क्षेत्र के लोगों ने इस असंवेदनशील घटना को दुर्भाग्यजनक बताते हुए कहा कि आज के स्वार्थपरता और संवेदनहीन दौर में परोपकार और मदद का जज्बा लगातार कम होता जा रहा है. बेजुबा जानवर ही नहीं सड़क पर पड़े घायल लोगों की मदद के लिए भी चंद लोग ही आगे आते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो वर्षों से सड़कों पर आवारा मावेशियों की समस्या लाइलाज क्यों बनी रहती और आए दिन दुर्घटनाग्रस्त लोग दम क्यों तोड़ते?
सेक्टर- 6 बी मार्केट के एमजीएम स्कूल रॉड पर तीन दिनों से घायल और बीमार पड़े इस सांड की दर्दनाक दस्ता यह है कि यह दुर्भाग्यसाली मूक जानवर आखिरकार आज दिन गुरुवार 3 बजे पोला के दिन इलाज के अभाव में चल बसा जबकि मार्केट के वे ही 4, 6 लोग 3 बजे तक गौशालाओ और नगर निगम, बीएसपी से मदद की गुहार लगाते रहें.
