रायपुर : छत्तीसगढ़ में बढ़ते प्रदूषण के विरुद्ध सख्ती की तैयारी प्रारंभ हो चुकी है. छत्तीसगढ़ पर्यावरण मंडल के कार्यक्षेत्र की परिधि में अब यातायात व कृषि क्षेत्र से होने वाले प्रदूषण को भी लाया जाएगा. इसका तात्पर्य यह है कि अब पर्यावरण संरक्षण मंडल यातायात व कृषि क्षेत्र से होने वाले प्रदूषण की भी निगरानी कर प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी उपायों को लागू कर पाएगा. राज्य के कुल क्षेत्रफल के 41% से अधिक भूभाग के वनाच्छादित होने से यहां का पर्यावरण देश के अन्य राज्यों की तुलना में संतुलित तो है परंतु बढ़ते औद्योगीकरण और मशीनीकरण के दौर में सावधानी रखने के अपने निहितार्थ हैं.

राज्य में अब तक उद्योगों से होने वाले प्रदूषण पर ही पर्यावरण संरक्षण मंडल को कार्रवाई का अधिकार था, हालांकि यह स्थापित सत्य है कि उद्योगों से अधिक वायु व ध्वनि प्रदूषण सड़कों पर चल रहे वाहनों से होता है. विगत चार वर्षों में राज्य सरकार ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनका सकारात्मक परिणाम भी सामने आया है.
पिछले महीने राष्ट्रीय स्तर की एक संस्था ने देश के सभी राज्यों में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जा रहे उपायों का आकलन कर रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में बेस्ट परफार्मिंग स्टेट की श्रेणी में छत्तीसगढ़ सभी राज्यों में दूसरे स्थान पर तथा मोस्ट इंप्रूव्ड स्टेट की श्रेणी में प्रथम स्थान पर रहा. यह सर्वेक्षण सल्फर आधारित SO2 तथा नाइट्रोजन आधारित NO2 पार्टिकुलेट मैटर की वायुमंडल में सघनता तथा वन आवरण पर आधारित था. छत्तीसगढ़ ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विभिन्न सुधारात्मक कार्य कर बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया है.
विगत चार वर्षों में कोयला, लौह अयस्क व डोलामाइट के उत्पादन में वृद्धि से खनिज आधारित उद्योगों का प्रसार हुआ है परंतु सरकार ने इन चुनौतियों का सकारात्मक ढंग से सामना किया है. कांग्रेस शासन के चार वर्षों में राज्य में 18 नए परिवेशी वायु गुणवत्ता केंद्रों की स्थापना की गई है. पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जा रहे उपायों से यहां वायुमंडल में एसओ 2 की सांद्रता वर्ष 2016 के 26.02 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2020 में 16.34 प्रतिशत हो गई है व इसमें 37 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है.
एनओ 2 की सांद्रता 2016 के 24.11 से घटकर 19.28 प्रतिशत ही रह गई है. राज्य की औद्योगिक नीति में उद्योगों के कुल क्षेत्रफल के 30 प्रतिशत में वृक्षारोपण को अनिवार्य किया गया है. राज्य में 2015 से 2019 के मध्य वन आवरण 41.12 था, जो अब 41.14 हो गया है. वृक्ष आच्छादन 2.06 से बढ़कर 3.01 हो गया है. पर्यावरण संरक्षण में सरकारी नियमों से अधिक प्रभावी उपाय जनजागरण है. लोग अपनी जिम्मेदारी समझेंगे तो प्रदूषण को आसानी से नियंत्रित किया जा सकेगा. आशा की जानी चाहिए कि हमारे राज्य में वायु व जल शुद्धता बनी रहेगी.
