“हर घर संविधान, घर-घर संविधान” कार्यक्रम में बोले प्रो. लक्ष्मण यादव
गणतंत्र दिवस के अवसर पर संविधान महासभा द्वारा “हर घर संविधान घर-घर संविधान” अभियान छेड़ा जा रहा है. इस मौके पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. लक्ष्मण यादव भी छत्तीसगढ़ पहुंचे. उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की 95 से 97 प्रतिशत आबादी एससी-एसटी, ओबीसी और कमेरा लोगों की है. इसलिए संविधान को बचाने की लड़ाई भी इन्हीं को लड़नी होगी. उन्होंने कहा कि वे किसी का नाम नहीं लेंगे, क्योंकि कोई इतना बड़ा है ही नहीं कि उसका नाम लिया जाए.

उन्होंने कहा कि कुछ लोग आदिवासियों का हक छीनना चाहते हैं. पिछली बार जब-जब वे छत्तीसगढ़ आए तो कभी बुद्ध पूर्णिमा तो कभी बुद्ध जयंती मनाई जा रही थी. सिरपुर के अंतरराष्ट्रीय बुद्धिस्ट महोत्सव में जाकर महसूस किया कि कभी वहां 10 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों को शिक्षा देने का सबसे बड़ा पुराना केन्द्र था. वह जड़ें हमारी हैं, शिक्षा और तालिम की.
पिछले दिनों विश्व आदिवासी दिवस पर छत्तीसगढ़ की जंगलों की तरफ गये. बालोद जिले के तुएगोंदी में देखा कि लाखों आदिवासी बारिश में भीगते हुये भी अपनी संस्कृति को बचाने के लिये सड़क पर खड़े हैं. पिछले दिसम्बर में देखा कि सतनामी समाज के लोग गुरुघासी दास जयंती मना रहे हैं और 5 हजार से ज्यादा विद्यार्थी बैठकर अपनी परंपरा को याद कर रहे हैं.

ओबीसी समाज के लोगों ने जब पुरखा के सुरता कार्यक्रम किया और किसान, कामगार, कमेरा लोगों को इकट्ठा किया तो लगा कि छत्तीसगढ़ तो बहुत सही रास्ते पर जा रहा है. इस बार आने पर पता चला कि कोई बाबा घूम रहे हैं. वो कथा सुनाकर एक लोटा जल से सभी समस्याओं को हल कर रहे हैं. उधर एक बाबा नागपुर में कथा सुनाकर भविष्य बता रहे हैं. टीवी और मीडिया ये साबित करने में लगे हुये हैं कि बाबा बिल्कुल सही बोल रहे हैं. अगर यह सही है तो स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय बंद कर देने चाहिए. अस्पताल में भी बाबा बैठा देना चाहिए. भाई कमाल का देश हो गया है. धार्मिक किताबों में ताकत होती तो सारी खोज वो कर देते. विज्ञान की बनाई हुई टीवी, सेटेलाइट से चल रही टीवी, मोबाइल फोन, कपड़े लत्ते आदि तमाम चीजों की कोई जरूरत नहीं रह जाती. जितना भी कुछ हम चारों तरफ देख रहे हैं, सब विज्ञान और तकनीक से बना. सारा फायदा विज्ञान से ले रहे हैं और कह रहे हैं कि ऊपर वाले से नजर मिली हुई है. इतना ही ज्ञान है तो प्रधानमंत्री को क्यों नहीं बताते कि चीन भारत पर कब हमला करने वाला है? रुपया कब डॉलर से ऊपर चला जाएगा? महंगाई कैसे कम होगी? बताओ कि पंद्रह लाख रुपया कब खाते में आएगा? 2 करोड़ लोगों के रोजगार का क्या हुआ?
ऐसे वक्त में जिन लोगों ने “हर-घर संविधान, घर-घर संविधान” की मुहिम छेड़ी है वो भारत को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. एक तरफ देश को बर्बाद करने वाले लोग हैं और दूसरी तरफ तथागत बुद्ध से लेकर कबीर, रैदास, पल्टू दादूभीखा, बुल्लेशाह फरीद और नारायण गुरू, बसवअन्ना, चोखामेला, अब्दुल कय्यूम अत्तारी, ज्योतिबा फुले, साहू जी महाराज, डॉ. भीमराव आम्बेडकर, डॉ. राम मनोहर लोहिया, मंडल, कांशीराम के वारिस खड़े हैं.
प्रो. यादव ने बताया कि पिछली बार जब छत्तीसगढ़ आए थे तब लाखों की भीड़ में करोड़ों रुपये का चंदा लेकर कथा भागवत वाले जाते-जाते बोलकर गये हैं कि भारत का संविधान बदलना है और हिंदू राष्ट्र बनाना है. ये कौन से धर्म का प्रचार है? संविधान बदल दोगे तो धर्म का प्रचार किस अधिकार से करोगे. धर्म के प्रचार का अधिकार भी तो संविधान ने ही दिया है.
उन्होंने कहा कि जो पार्टी स्कूल बर्बाद करे, अस्पताल बर्बाद करे, नौकरी खत्म करे, महंगाई बढ़ाये, बेरोजगारी बढ़ाये, ऐसी पार्टी को हराना होगा. भागवत कथा में राजनीति घुसेड़ने वालों को चंदा देना बंद कर दो, इनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी. धार्मिक आयोजनों को चंदा देने से अच्छा है किसी बच्चे को कलम-किताब खरीद दो, किसी भूखे को रोटी खिला दो, किसी बीमार को दवा दिला दो. भगवान ज्यादा खुश होगा.
बाबा साहब ने अपनी किताब के अंतिम पन्नों पर लिखा है कि जाति के खात्मे के लिये रोटी-बेटी का संबंध होना चाहिए. अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देना चाहिए. पुजारियों का इंटेलिजेंस टेस्ट होना चाहिए. जो पुजारी परीक्षा देकर पास हो जाए, फिर चाहे वह किसी भी जाति का हो, उसे ही पुजारी बनाया जाना चाहिए. अपने अपने मंदिरों में पूजा-पाठ स्वयं करो. जिस दिन इस देश की मंदिर जानेवाली भीड़ स्कूल विश्वविद्यालय जाने लगेगी, इस देश को सोने की चिड़िया बनने से कोई नहीं रोक सकेगी.
तुरत-फुरत में नहीं हो सकती क्रांति
उन्होंने कहा कि इस देश के लोगों ने बाबा साहेब की नहीं सुनी, फुले साहेब की नहीं सुनी, साहू जी महाराज की भी नहीं सुनी. लोगों ने कभी कबीर की भी नहीं मानी, रविदास की नहीं मानी तो हमारी सुनकर तुरंत क्रांति कर देंगे, ऐसा नहीं सोचना चाहिए.
यहां लोग हिन्दू मुसलमान के नाम पर समाज को बांट रहे हैं. 80 प्रतिशत लोग बता रहे हैं कि उन्हें 20 प्रतिशत लोगों से खतरा है कि वो अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं. कबीर ने कहा था, “हिंदू कहूं तो हूं नहीं, मुसलमान भी नाई और गये भी दोनों बीच में खेलूं दोनों माई.’ ‘हिंदू कहे मोहे राम पियारा तुरंत कहे रहमाना और आपस में दोऊ लड़ी मुये है मरम कोई नहीं जाना’. हमारे पुरखा कबीर 700 साल पहले यह कह गए थे कि हिंदू मुसलमान के नाम पर लड़ाने वाले आपके बच्चों का भविष्य बरबाद करने वाले है. रामचरित मानस में भी लिखा हुआ है कि “पूजति विप्र सील गुण हीना शुद्ध न गुन गन गयान प्रचीना”.
नक्का आ गया, नक्का आ गया
प्रो. यादव ने कहा कि नई पीढ़ी को भटकाया, भरमाया जा रहा है. एक गांव में एक आदमी की नाक कट गई तो सब उसको नक्का आ गया, नक्का आ गया कह कर चिढ़ाने लगे. उसने दिमाग लगाया. उसने कहना शुरू कर दिया कि नाक उसने स्वयं जानबूझकर काटी है ताकि ईश्वर के दर्शन हों और मोक्ष मिल जाए. फिर एक-एक कर बहुतों ने अपनी नाक कटवा ली. मूर्खों की भीड़ ऐसे ही तैयार की जाती है. 1990 और 2000 के बीच एक बार ऐसा समय जाया था जब एक देवता की मूर्ति दूध पीने लगी थी. टीवी नहीं था, मोबाइल भी नहीं था पर बात पूरे देश में फैल गई. लोग सारा दूध जाकर मूर्तियों को पिलाने लगे. कुछ दिनों के बाद खबर आई कि मूर्तियों ने दूध पीना बंद कर दिया.
भारत आकर जातिवादी हो गया इस्लाम
इस्लाम ने दुनिया को समानता और मोहब्बत का पाठ पढ़ाया और भारत में आकर जातिवादी हो गया. खान पठान शेख सैय्यद एक तरफ और पसमादा एक तरफ. इन बातों का किसी धर्म से कोई मतलब ही नहीं है. अगर आप अपनी पीढ़ियों को अंधविश्वासी बनाएंगे तो आपकी पीढ़ियां मानसिक रूप से गुलाम पैदा होंगी. कोई धर्म बचाने के लिए तो कोई लड़ाने के लिए आएगा. आपका बच्चा बर्बाद हो जाएगा. बच्चों को अंधविश्वास और अंधभक्ति से बचाइए, उन्हें स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय भेजिये, तभी वह जाकर बचेगा. इसके लिये संविधान बचाना जरूरी है.
बचाना हमारी जिम्मेदारी
उन्होंने कहा कि आपके बच्चों की शिक्षा और रोजगार की चोरी हो रही है. आपकी कलम किताब खतरे में है. भारत का संविधान अनुच्छेद 51 (ए) इस बात की इजाजत देता है कि हम अपने देश में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करेंगे. आप अपना पक्ष चलाओ हम अपना चलाएंगे. जिसकी बात सही होगी उसकी बात आगे बढ़ जाएगी. इतना सा ही तो खेल है.
सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलता है. सरकारी चीजें प्राइवेट को बेची जा रही है. इसलिए प्राइवेट सेक्टरों में भी आरक्षण होना चाहिए. आबादी के अनुपात में उनको जगह मिलनी चाहिए. ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’ का नारा देने वालों ने आरक्षण बढ़ाया तो धर्म की बात करने वालों ने उसका विरोध क्यों किया?
अगर आरक्षण न होता तो इतनी बड़ी संख्या में एससी, एसटी, ओबीसी के लोग प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील नहीं बन पाते. न्यायपालिका में आरक्षण नहीं है बावजूद इसके सुप्रीम कोर्ट में दो शेड्यूल कास्ट के जज है और एक ओबीसी के जज है. इस देश के 45 केन्द्रीय विश्वविद्यालय में आज की तारीख में 90 से 99 प्रतिशत तक एससी, एसटी, ओबीसी के प्रोफेसरों के पद खाली पड़े है. केवल 41 प्रोफेसर ओबीसी के है और 20-25 पोस्ट शेडयूल्ड कास्ट के हैं. 10 पोस्ट एसटी हैं. 90 प्रतिशत पोस्ट में कौन हैं?
रीड, राइट एंड फाइट
रीड, राइट एंड फाइट, अर्थात पढाई लिखाई और लड़ाई का वक्त आ गया है. किसी से डरने की जरूरत नहीं है. हम गलत रास्ते पर नहीं हैं. हम तो हक की बात कर रहे हैं. भगतसिह ने एक लेख लिखा है – मैं नास्तिक. आज की तारीख में लिखा होता तो पता नहीं उनका क्या होता? आज अगर कबीर होते, तो कहां इतनी निर्भीकता से अपनी बात कह पाते जो कहते थे ‘पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़’. क्या वह कह सकते थे कि ‘माटी का एक नाग बनाके, पूजे लोग लुगाया, जिंदा नाग जब घर में निकले, ले लाठी धमकाया.
वी द पीपुल ऑफ इंडिया
हमारा संविधान “वी द पीपुल ऑफ इंडिया” हम सब भारत के लोग से शुरू होता है. इसलिए हम उस संविधान को बचाने के लिये लड़ रहे हैं. उस संविधान ने हम सबको बराबर का अधिकार दिया है. इस देश में आस्तिकों को जितना हक है भक्ति करने का उतना ही हक इस देश में नास्तिकों का भी है. घासीदास लिखते हैं- “जात पात माने नहीं सत के महिमा गावे और पावन जेखर आचरण वो सतनामी कहावय. मनखे अछूत झन लियो कहो सिर्फ सम्मान और जातपात ला त्याग के सत पर देव जो जान’. गुरू घासीदास हमारी मोहब्बत की परंपरा में है. हम जातियों को जातियों से जोड़कर 90 प्रतिशत आवाम को एक करने की परंपरा में है. कुछ लोग कबीर के खिलाफ भी थे. ज्योतिबा फुले के खिलाफ भी लोग थे. सावित्री बाई फुले स्कूल पढ़ाने जाती थी तो पत्थर मारते थे. डॉक्टर आम्बेडकर को रहने को घर नहीं देते थे. डॉक्टर लोहिया की किताबों को छपने को नहीं दिये.
इसी तरह कांशीराम ने कहा कि जब वोट देने का अधिकार नहीं है तो किस बात का संविधान. अब लड़ाई बैलेट और बुलेट दोनों से होगी. तब कहीं जाकर उनको अपना हक मिला नहीं तो सामंती इन जातियों को वोट नहीं डालने देते थे. वोट डालने का यह अधिकार भी संविधान से मिला. पढ़ने का अधिकार, कोई भी पेशा चुनने का अधिकार, समानता का अधिकार, संविधान से मिला.
इस तरह बिक रहा है देश
समाजवादी आंदोलन और अम्बेडकरवादी आंदोलन का नारा था- ‘सौ से कम ना हजार से ज्यादा समाजवाद का यही तकाजा’. गरीब अमीर के बीच 100 से 1000 के बीच की खाई नहीं होनी चाहिए. कुछ लोग हमारे देश में इतने अमीर हो गये हैं कि अपने नेता को वोट दिलाते हैं और उसको पैसा देश बेच कर दिया जाता है. बेचते वेचते अपने दोस्त को दुनिया का सबसे बड़ा आदमी बना दिया. देश बिक रहा है. रेल बिक गई, भेल बिक गई. बीएसएनएल बिक गया, एमटीएनएल दे दिया, और अब बैंक बिक रहे है, एलआईसी बिक रही है. शिक्षा नीति बिक रही है, जमीन और कंपनी बिक रही है. नवरत्न कंपनिया बिक रही है. सारा प्राइवेट सेक्टर बनता चला जा रहा है यह देश बिक नहीं रहा है तो क्या हो रहा है.
इस जाल में मत फंसना
शिकारी आएगा जाल फैलाएगा, दाना डालेगा. हम अपने पुरखों की बात सुने बिना उस जाल में फंसते चले जाएंगे. अगर अलग-अलग इस जाल से निकलना चाहेंगे तो नहीं निकल पाएंगे. सब मिलकर जोर लगाएंगे तो यह जाल खुद ही उखड़ जाएगा. इसलिए सबको मिलकर प्रयास करना है. किसी को अकेला नहीं छोड़ना है.
इसी तरह जातियों को जातियों से लड़ाया जा रहा है. आपस में हमारी कोई दुश्मनी नहीं है. एक बार दो बिल्लियों को रोटी का एक टुकड़ा मिल गया. वे खुद फैसला नहीं कर पाईं तो बंदर के पास जा पहुंची. बंदर ने रोटी के दो टुकड़े किए और फिर उन्हें बराबर करने के लिए कभी एक रोटी का थोड़ा खाया तो कभी दूसरी रोटी का. ऐसा करते करते बंदर पूरी रोटी खा गया. बिल्लियां लड़ती रह गईं. इसलिए आपस में लड़ना बंद करना है वरना न्याय नहीं मिलेगा.
“लड़ने के लिये चाहिए थोड़ी सी सनक”
बहुत समझदार और सुलझे हुए लोग नहीं लड़ सकते
कोई लड़ाई, नहीं लड़ सकते कोई क्रांति
अब घर में लगी हो भीषण आग,
आग की जद में हो बहनें और बेटियां,
तो आग के सीने पर पांव रखकर
उन्हें बचा लेने के लिये नहीं चाहिए कोई दर्शन
नहीं चाहिए कोई महान विचार
चाहिए तो बस थोड़ी सी सनक,
थोड़ा सा पागलपन और एक खिलखिलाहट
और बचाने के लिये बेवजह झुलस जाने का हुनर।
