कवि /साहित्यकारों ने वृक्षों के महत्व का किया गुनगान, धरती में हरियाली फैलाने की अपील
राजनांदगांव- पर्यावरण दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ साहित्य सृजन समिति द्वारा छत्तीसगढ़ गीतों में प्रकृति प्रेम विषय पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया. लोक सांस्कृतिक संस्था धरोहर कार्यालय – कन्हारपुरी में आयोजित उक्त कार्यक्रम में साहित्य समिति की ओर से लोक गायक महादेव हिरवानी को आम और पीपल का पौध प्रदत्त करते हुए संस्था कार्यालय में जन कवि मस्तुरिहा और संगीतकार खुमान साव के नाम पर पौध रोपण कर किया गया. इस दौरान दोनों पौधों को लहलहाने के लिए खाद्य-पानी सिंचन कवयित्री सुषमा शुक्ला “अंशुमन” व लोक गायिका शिवानी जंघेल द्वारा किया गया.
काव्य गोष्ठी की शुरुआत कवि मस्तुरिहा जी के गीत -“मोर खेती- खार रुमझुम” से हुई. इस पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि साहित्यकार व लोक कला धर्मी आत्माराम कोशा “अमात्य” ने कहा कि, नागफनी की तरह कंटीले वृक्ष, हरियर – हरियर बम्हुरी में सोन के खिंनवा ,,जैसी कल्पना मस्तुरिहा जी जैसे कवि ही कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि मस्तुरिहा जी अपनी रचनाओं में भारत माता, गांधी बबा , प्रकृति प्रेम व व छत्तीसगढ़ की दया- मया को वर्ण्य विषय बनाया, और सुमधुर स्वरो में गाकर नाम कमाया वहीं संगीतकार खुमान साव को उनकी पूण्य तिथि पर याद करते उन्होंने कहा कि मस्तुरिहा और साव की जोड़ी फ़िल्म दुनिया के गीतकार हसरत जयपुरी ,शैलेन्द्र और संगीतकार शंकर जयकिशन की तरह रही. दोनों ने छत्तीसगढ़ी में एक से बढ़कर एक गीत दिए,, जो आज धरोहर बने हुए है.
साहित्य समिति के अध्यक्ष अखिलेश मिश्रा अकाट्य ने प्रकृति श्रृंगार के लिए पेड़- पौधों का होना जरूरी बताते हुए पंच भूत तत्व को पर्यावरण का प्राण कहा वही कवि गजेंद्र हरिहारणो “दीप” ने,,शब्द बढाए प्रीत को,,शब्द जगत का मूल / एक करें अनुकूलता एक करें प्रतिकूल कहा . कवि थंगेश्वर कुमार साहू “मीत” ने मस्तुरिहा जी के “मोर संग चलव” को प्रकृति व पर्यावरण से जोड़ते हुए अपनी रचना में -जेठ महिना में आगी बरसे,, रुख़ -राई सबों मुरझाय,, कह ,छाया देने वाले वृक्ष के महत्व को रेखांकित किया. इसी तरह कवि विरेंद्र कुमार रंगारी ने- कुछ होने लगा हूं मैं,, फुरसत के पलों को जीने लगा हूं मैं कहा.
स्वर्ग को धरती पर ला देने की कल्पना
लोक गायिका शिवानी जंधेल ने कहा कि यदि हमारी पृथ्वी, वन- उपवन नदी- नाले पर्वत-डोंगरी से आच्छादित है तो मस्तुरिहा जी की “सरग ला धरती में ला दूहूं”,,की कल्पना साकार हो सकती है. इस अवसर पर कवि लखन लाल साहू “लहर” व रौशन साहू मोखलिहा ने,बंगला बारी के सोन चिरैया, आ जाबे,तरिया पार,,कह मस्तुरिहा जी को याद किया वहीं कवयित्री सुषमा अंशुमन ने अपनी कविता में – घाम नी होतिस त,छंईहा के महत्व ला कहां मानतेन,/पशु-पक्षी के लहकई के पीरा ल कहां जानतेन,,कह कर तालियां बटोरी.
कवि कथाकार मानसिंह “मौलिक” ने पर्यावरण के बैरी नामक कविता का पाठ कर कहा कि प्रकृति का मन-माना दोहन व बम- बारुद का प्रयोग पृथ्वी को विनाश की ओर धकेलने वाला है.
कवि ओमप्रकाश साहू अंकुर ने मस्तुरिहा जी के प्रकृति प्रेम में भीगे,,फिटिक अंजोरी निरमल छंइहा,, पुन्नी के चंदा को याद किया वहीं आनंद राम सार्वा “अनंत” ने अनमोल बेरा झन खो ,, तो पवन यादव “पहुंना” ने – बखरी बारी के आमा खावन, डोकरी दाई बखाने / छकत ले खावन छीताफल,,तभोले मन नहीं माने,,कहा.
प्रकृति प्रेम की बानगी, चलें पुरवइया सनन- सनन
कवि /गीतकार जीवन लाल -शेंडे ने जहां चलें पुरवइया सनन- सनन कह प्रकृति प्रेम की बानगी प्रस्तुत की वहीं कवि / लोक कलाकार पप्पू “पौर्वात्य’ कलिहारी ने मस्तुरिहा जी के संबंध में कोशा जी की कृतज्ञांजलि रचना – तंय कहां चल देय , अबड़ दुरिहा,,/ नइ बाजे तोर घुनही बांसुरिया,., सब के मन ल मोह इया,/,सुघ्घर गीत गवइया भाई रे,, लछमन मस्तुरिहा,,,को सुर देते हुए प्रकृति प्रेम और दया -मया के गीत “मंगनी म मया नहीं मिले” को याद किया. काव्य-गोष्ठी का समापन- चंदैनी-गोंदा के गीत- तीपे चाहे भोंभरा, झन बिलमहु छांव में,, जाना हे,,,हमला ते,, गांव अभी दुरिहा हे,, के साथ किया गया.
इस अवसर पर खुमान संगीत अकादमी के संस्थापक गोविंद साव के अलावा बड़ी संख्या में उपस्थित कवि साहित्यकारों,काव्य -रसिको व छत्तीसगढ़ी लोक संगीत सुधियो का आभार प्रदर्शन लोक गायक महादेव हिरवानी द्वारा किया. उक्ताशय की जानकारी साहित्य समिति के सचिव मानसिंह मौलिक द्वारा दी गई.
