चिटफंड: कब और कैसे मिलेगा न्याय?

भिलाई- चिटफंड कंपनियों की लूट से पीड़ित देश के करोड़ों निवेशकों और जमाकर्ताओं का जमा धन उन्हें कब वापस मिलेगा. इस यक्ष प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं है. शासन और प्रशासन तंत्न के अलावा देश की न्याय व्यवस्था तथा निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी इस मामले में जवाबदेही से लगातार बचने की कोशिश में अपने जिम्मेदारियों को दूसरे के ऊपर थोपने की कारगुजारियों में समय काट रहे हैं और उन करोड़ों पीड़ितों की जिंदगी भी संघर्ष और पीड़ा के दौर से गुजरते हुए किसी तरह कट रही है. अकेले छत्तीसगढ़ की बात करें तो सन् 2000 में राज्य बनने के बाद इस नवोदित प्रदेश में बड़े पैमाने पर चिटफंड कंपनियों और कथित बेकिंग संस्थाओं का आगमन हुआ. इन संस्थाओं को बड़े नौकरशाहों, पुलिस और राजनेताओं का भी सहयोग मिला और कहीं-कहीं तो इनमें भागीदारी और साझेदारी भी देखने को मिली. यह सच है, कि ऐसे तमाम संस्थान और उनके संचालक अन्य प्रदेशों से आये लेकिन स्थानीय लोगों ने ‘भी कुछ नये संस्थानों को पंजीकृत कराकर अपना कारोबार फैलाया और कुछ वर्षों के अंतराल में निवेशकों तथा जमाकर्ताओं का पैसा हड़पकर गायब हो गये. बड़ी संख्या में चिटफंड कंपनियों और कथित बैंकिंग संस्थानों की ठगी का शिकार बने प्रदेश के लाखों पीड़ितजनों के आक्रोश और पीड़ा को देखते हुए भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार ने पीड़ितों को उनकी जमा राशि वापस कराने के लिए प्रयास तो अवश्य क्रिया और कुछ पीड़ितों को उनकी जमा राशि का कुछ हिस्सा वापस भी मिला लेकिन यह बिलकुल अपर्याप्त और ऊंट के मुंह में जीरा वाली कहावत को चरितार्थ करने जैसा रहा.
चिटफंड कंपनियों में डुबी 50 हजार करोड़ की राशि
एक अनुमान के अनुसार छत्तीसगढ़ में लगभग 50 हजार करोड़ की राशि चिटफंड कंपनियों और फर्जी बैंकिंग संस्थानों में डूबी हुई हैं. न्याय प्रक्रिया की धीमी चाल, सरकारी तल की उदासीनता और मिलीभगत के अलावा जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी पीड़ित निवेशको और जमाकर्ताओं को न्याय व राहत नही मिलने के लिए जिम्मेदार है. दुर्भाग्यजनक तथ्य यह है कि ऐसी लुटेरी संस्थाओं के हॉयरेक्टर और प्रमोटर काफी धन कमाकर मजे में हैं, ऐसे लोगों के खिलाफ कारगार कार्रवाई करने में भी शासन-प्रशासन विफल रहा है. कई मामलों में जमाकर्ता एजेंटों को दोतरफा परेशानी झेलनी पड़ी. संस्थाओं के बंद होने से जमाकर्ता एजेंट और कर्मचारी बेरोजगार हुए और उन्हें उन लोगों की प्रताड़ना का भी शिकार होना पड़ा, जिन्होंने इन एजेंटों या कर्मचारियों के माध्यम से संबंधित संस्थानों में अपना राशि जमा की थी.
एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग से हुए लूट के शिकार
कई मामलों में पुलिस ने जमाकर्ता एजेंटों और संस्थान के कर्मचारियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भी भेजा लेकिन आज भी अधिकांश संस्थानों के मुख्य कर्ता-चर्ता पकड़ से बाहर है और प्रापर्टी जब्त होने के बावजूद उसकी नीलामी कर पीड़ितों को राशि वापस करने की प्रक्रिया पर नजर डालें तो यह न के बराबर है. ऐसे मामलों में यह भी ध्यान देने योग्य है कि कुछ लुटेरी संस्थाओं के मालिक या डॉयरेक्टर भी गिरफ्तार हुए लेकिन इन संस्थानों के प्रमोटर्स जो स्थानीय और प्रभावशाली लोग हैं. जिनके माध्यम से संस्थानों का प्रचार-प्रसार तथा सरकारी अधिकारियों और सत्तासीन नेताओं के साथ-साथ गठबंधन हुआ ऐसे प्रमोटर्स साफ बच निकले हैं, जिनके खिलाफ अभी भी सूक्ष्म जांच और कड़ी कार्रवाई आवश्यक है. वर्तनान मे न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों पीड़ितों का संगठन तैयार हो चुके हैं. ऐसी उम्मीद है, कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से जनआंदोलन जोर पकड़ेगा और एक न एक दिन केंद्र सरकार को इस गड़बड़ी के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार सेबी को भी पीड़ितों को न्याय और उनका हक देने के लिए विवश होना पड़ेगा. जहां तक ऐसे संस्थानों के हजारों-लाखों कर्मचारियों और स्थानीय जमाकर्ता एजेंटो का सवाल है, उनमें से अधिकांश अपने संस्थानों के मालिकों, डॉयरेक्टरों और प्रमोटर्स की साजिरा से बिलकुल अनजान थे. वे लोग नौकरी व रोजगार के लालच में इन संस्थानों के कारोबार में शामिल हुए, आज ये लोग भी बेरोजगारी और जनाकर्ताओं के दबाव से पीड़ित हैं निवेशकों के दबाव और पुलिस प्रताड़ना के चलते 42 एजेंटों की मौत हो चुकी है. प्रदेश में लगभग 30 लाख निवेशक/जमाकर्ता परिवारों का अनुमानित 50 हजार करोड़ रुपये और सम्पूर्ण भारत में करीब 42 करोड़ निवेशक/ जमाकर्ताओं का 50 लाख करोड़ रुपये योजनाबद्ध तरीके से षड्यंल पूर्वक लूट का गोरखधंधा शासन और प्रशासन की नाक के नीचे चलाया गया. इस लूट के शिकार होने वालों में 95 फीसदी लोग एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग के हैं.
छत्तीसगढ़ पुलिस ने 400 से अधिक एजेंटों को गिरफ्तार कर जेल भेजा था, जिन्हें भूपेश बघेल की सरकार ने राहत दी. जरूरत इस बात की है, कि इन्हें भी जमाकर्ताओं और निवेशकों के साथ लेकर सभी पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सभी जनसंगठन आगे आएं और प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर एक सशक्त जन आंदोलन खड़ा हो, तभी बड़े पैमाने पर हुई इस लूट के पीड़ितों को न्याय मिल जाएगा.
