रायपुर : छत्तीसगढ़ में देवी आराधना का पर्व चैत्र नवरात्रि बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. श्रद्धालु सुबह से शाम तक देवी मंदिरों में दर्शन करने लिए पहुंच रहे हैं. नवरात्रि के सातवें दिन सप्तमी को रायपुर के देवी मंदिरों में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे. पुरानी बस्ती स्थित प्राचीन महामाया दरबार में सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है. लोग कतार में लगकर अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं.

मंगलवार को भी भक्तों की बड़ी-बड़ी लाइन लगी रही. बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता रानी के दर्शन करने पहुंचे. रायपुर और प्रदेश के अन्य जिलों से भक्तगण सुबह से ही मंदिर पहुंचने लगे थे. सप्तमी के महामाया माता रानी का विशेष श्रृंगार किया गया. वहीं बुधवार की रात 12 बजे से मंदिर में विशेष अनुष्ठान और पूजा किया गया. बता दें कि देवी शक्तिपीठों में से रायपुर का महामाया मंदिर एक है. 1400 वर्ष पुराने महामाया मंदिर में नवरात्रि पर भक्तों का तांता लगता है.
मंदिर का इतिहास
मंदिर के पुजारी पंडित मनोज शुक्ला के अनुसार, राजा मोरध्वज द्वारा प्रतिस्थापित मंदिर का जीर्णोद्धार कालांतर में 17वीं-18वीं शताब्दी में नागपुर के मराठा शासकों ने करवाया. मंदिर का गर्भगृह, द्वार, तोरण, मंडल के मध्य के छह स्तंभ एक सीध में हैं. दीवारों पर नागगृह चित्रित है. बताया जाता है कि कल्चुरी वंश के राजा मोरध्वज ने मां के स्वप्न में दिए आदेश पर खारुन नदी से प्रतिमा को सिर पर उठाकर पुरानी बस्ती के जंगल तक पांच किलोमीटर पैदल चले. राजा जब थक गए तो प्रतिमा को एक शिला पर रख दिया. इसके बाद प्रतिमा अपनी जगह से हिली नहीं. मजबूर होकर उसी अवस्था में मंदिर का निर्माण किया गया. खास बात यह है कि मां महामाया देवी मंदिर में विराजी मां की मूर्ति थोड़ी-सी तिरछी दिखती है. इसका कारण है कि रखते समय प्रतिमा थोड़ी तिरछी हो गई. रायपुर के महामाया मंदिर में माता महालक्ष्मी के रूप में भक्तों को दर्शन देती हैं. यहां पर मां महामाया और मां समलेश्वरी देवी विराजमान हैं. सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें माँ महामाया के चरणों का स्पर्श करती हैं और सूर्योदय के समय किरणें माँ समलेश्वरी के चरणों का स्पर्श करती हैं. इस बार महामाया मंदिर में 10 हजार से अधिक ज्योति कलश प्रज्ज्वलित किए गए हैं.
10 साल की कुंवारी कन्या ही जलाती है ज्योत
इस मंदिर जुड़ी कई अनोखी परंपराएं और मान्यताए हैं. मंदिर में ज्योत जलाने की परंपरा भी विशेष है. यहां पर पहली ज्योत जलाने के लिए 10 साल से कम उम्र की कुंवारी कन्या को लाल चुनरी के साथ माता के स्वरूप में तैयार किया जाता है. मुख्य पुजारियों की मौजूदगी में मंदिर में मंत्रोच्चार के साथ पहला ज्योति कलश जलाया जाता है. ज्योति कलश जलाने के लिए माचिस की जगह चकमक पत्थर का इस्तेमाल किया जाता है. यहां माचिस का उपयोग नहीं किया जाता है. इसके बाद माता स्वरूप कुंवारी कन्या के लोग आशीर्वाद लेते हैं.
