हिमालय की 20 चोटियों को फतह कर चुकी है बस्तरबाला, राष्ट्रीय सेवा योजना के कैम्प से मिला था ब्रेक, बदला जीवन
राष्ट्रपति दे चुकी हैं तेनजिंग नॉर्गे राष्ट्रीय पुरस्कार, बस्तर में शुरू करना चाहती हैं पर्वतारोहण ट्रेनिंग सेंटर
बस्तर के लोगों ने नाम दिया “माउन्टेन वुमन”
दीपक रंजन दास- छत्तीसगढ़ की पहली एवरेस्ट विजेता महिला नैना सिंह धाकड़ इन दिनों लोगों का दिल जीतने के अभियान पर है. वह स्कूल कालेजों में जाकर युवाओं को अपने संघर्ष की कहानी सुना रही हैं और उन्हें लक्ष्य बनाकर परिश्रम करने के लिए प्रेरित कर रही हैं. वे बता रही हैं कि साधन का न होना सिर्फ एक बहाना है. मौके सभी को मिलते हैं, बस अवसर को पहचानकर उसका उपयोग सीखना होता है. पर्वतारोहण का पहला मौका उन्हें राष्ट्रीय सेवा योजना के शिविर में मिला. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. फिर भारत की प्रथम एवरेस्ट विजेता बछेन्द्री पाल से मुलाकात हुई. अब तक वे हिमालय की 20 शिखरों को जीत चुकी हैं. इनमें सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट के साथ ही दुनिया की चौथी सबसे ऊंची चोटी ल्होत्से भी शामिल है.


बस्तर में माउंटेन गर्ल के रूप में जानी जाने वाली नैना धाकड़ बताती है कि उनका बचपन पिता के लौटने का इंतजार करते बीता. पिता बोधन सिंह पुलिस में थे. जब वह चार साल की थी तभी उनका स्वर्गवास हो चुका था. मां विमला देवी अपनी तीन बच्चों को लेकर जगदलपुर से टाकरागुड़ा चली आई थी. वह हमेशा कहती कि पिता काम पर गए हैं, पर वो कभी लौटे ही नहीं. अभावों के बीच बच्चों का लालन पालन होता रहा पर नैना में आगे बढ़ने की तीव्र इच्छा थी. पहले उसने जूडो सीखना शुरू किया. तीन बार नेशनल भी खेला.
एवरेस्ट फतह करने वाली छत्तीसगढ़ की नैना का मानना है कि खेलों में असंभव को संभव कर देने की शक्ति होती है. यदि बचपन से ही खेलकूद के प्रति रूझान हो तो संघर्ष, सफलता और विफलता को समान रूप से स्वीकार करने का माद्दा पैदा हो जाता है. स्कूल कॉलेजों की क्रीड़ा प्रतियोगिताएं बच्चों को खेल से जुड़ने का अवसर देती हैं. नैना ने जगदलपुर स्थित महारानी लक्ष्मीबाई कन्या हायर सेकंडरी स्कूल से हायर सेकंडरी और बस्तर विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की है. यहीं वे राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़ीं और पर्वतारोहण का पहला पाठ पढ़ा.
नैना बताती है कि राष्ट्रीय सेवा योजना के जरिए ही 2010 में उन्हें पर्वतारोहण कैम्प का मौका मिला. हिमाचल प्रदेश में लगे इस ट्रेनिंग-कैम्प के दौरान उन्होंने देश के नामी पर्वतारोहियों से माउंटेनीयरिंग, रॉक-क्लाइम्बिंग और रिवर-क्रॉसिंग के बारे में सीखने को मिला. 2011 में नैना जॉब के सिलसिले में जमशेदपुर गई हुई थीं. यहां उनकी मुलाकात माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली देश की पहली महिला बछेंद्री पाल से हुई. बछेंद्री उनसे प्रभावित हुईं और उन्हें एक महीने की ट्रेनिंग पर चलने को कहा. नैना ने फौरन हां कर दी. देश के अलग-अलग राज्यों से 11 महिलाओं के साथ उन्हें एक महीने के लिए भूटान ले जाया गया. यह यात्रा को लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज है. बछेंद्री की सलाह पर नैना ने वर्ष 2012 में दार्जिलिंग स्थित हिमालय पर्वतारोहण संस्थान से पर्वतारोहण का कोर्स किया. साथ ही एएमसी, एचएमआई, एनआईएम, बेसिक एडवांस रॉक क्लाइम्बिंग कोर्स भी पूरा किया. इसके बाद दार्जिलिंग की पहाड़ी की चढ़ाई पूरी करने में सफल हुईं.
माउंटेन गर्ल बताती हैं कि उन्होंने एक अनोखा टारगेट ले रखा था. यह टारगेट था हर साल कम से कम एक उपलब्धि का. 2011 से यह क्रम बना हुआ है. हर साल वे एक न एक शिखर फतह करती हैं. 2021 के जून में उन्होंने मात्र 9 दिन के अभियान के बाद दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहरा दिया. यहां से उन्होंने बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ का नारा भी दिया. वे कहती हैं कि यदि वे कालेज नहीं जातीं तो एनएसएस से नहीं जुड़तीं. एनएसएस नहीं होता तो पर्वतारोहण से उनका परिचय नहीं होता.
जब खतरे में पड़ गई जान
नैना बताती हैं कि एवरेस्ट फतह कर उन्हें दोपहर तक लौट आना था. पर खराब मौसम के कारण उनकी तबियत बहुत बिगड़ गई थी. उनकी साथी पर्वतारोही छत्तीसगढ़ की ही याशी जैन पहले ही बेस कैम्प को लौट चुकी थीं. पर याशी लगातार नैना के प्रोग्रेस पर नजर रख रही थी. एक जून की सुबह नैना का एक्सपिडीसन पूर्ण हो जाना. परंतु दोपहर तक जब कोई उसकी कोई खबर नहीं आई तो याशी ने नैना की कंपनी से संपर्क किया. जैसे ही उसे पता चला कि नैना बीमार हो गई है और माउंट एवरेस्ट से नीचे आने की हिम्मत नहीं कर कर पा रहीं हैं तो उन्होंने छत्तीसगढ़ के प्रथम एवरेस्टर विजेता राहुल गुप्ता और अपने पिता अखिलेश जैन से संपर्क साधा. उन्होंने जगदलपुर प्रशासन से संपर्क साधा. जगदलपुर कलेक्टर रजत बंसल और एस डी एम गोकुल राऊते ने तुरंत नेपाल स्थित इंडियन एम्वेसी से बात की. प्रशासन के हरकत मे आते ही तुरंत रेस्क्यू आपरेशन शुरू हो गया. एक्सपर्ट शेरपा नैना को रेस्क्यू कर शाम छह बजे तक कैंप चार तक ले आया गया.
अब तक 20 से अधिक चोटियां फतह
जून 2021 में 9 दिन के भीतर दुनिया के सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट में 8848.86 मीटर और चौथी सबसे ऊंची चोटी माउंट लहोत्से में 8 हजार 516 मीटर पर चढ़ाई करके नैना ने इतिहास रचा था. भूटान, नेपाल, उत्तराखंड, सिक्किम लेह लद्दाख और 20 से भी अधिक ऊंची चोटियों पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर चुकी है. नैना ने 6,512 मीटर ‘भागीरथी 2’ को फतह कर नया कीर्तिमान बनाया है. भागीरथी-2 हिमालय की सबसे अधिक बर्फीली पहाड़ियों में से एक है, जो उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में है. ‘सेव हिमालय’ के मैसेज के साथ उन्होंने यह चढ़ाई की थी. नैना मोटरबल और खरंदुला में 6 हजार मीटर की ऊंचाई पर साइकिल चलाकर भी अपने साहस का लोहा मनवाया था. 30 नवंबर 2022 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नैना सिंह धाकड़ को तेनजिंग नॉर्गे पुरस्कार के रूप में स्मृति चिन्ह 15 लाख रुपये की राशि और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया.
राज्यपाल को नैना ने दिया यह प्रस्ताव
जून 2022 में राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके से मुलाकात के दौरान बस्तर की माउन्टेनगर्ल नैना धाकड़ ने राज्य में युवा पर्वतारोहियों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रशिक्षण संस्था की स्थापना की इच्छा जताई तथा उनसे मदद मांगी. साथ ही उन्होंने राज्य में पर्वतारोहियों को खेल कोटे में आरक्षण के संबंध में चर्चा कर ज्ञापन सौंपा.
