देवधान के औषधीय गुणों पर दिल्ली- लखनऊ में चल रहा शोध

बस्तर के कुरंदी और चांदामेटा जंगल में हजारों वर्षों से उपज रहा है देवधान
हेमंत कश्यप /जगदलपुर: बस्तर को दंडकारण्य कहा जाता है और यहीं देवधान उपजता है. लोक मान्यता है कि भगवान राम का वनवास दंडकारण्य में बीता था. यहीं माता सीता ने पुत्र जैसे देवर लक्ष्मण के दीर्घायु की कामना के साथ भोलेनाथ का व्रत किया था. अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद जंगली धान अर्थात देवधान से तैयार प्रसाद ग्रहण किया था. मान्यता है कि देवधान की दुर्लभता के कारण ही कमरछठ व्रत रखने वाली माताएं तालाब-डबरियों में उपजने वाले दूसरे जंगली धान को अपनाया. जो पसहर चाउर के नाम से चर्चित है.
ज्ञात हो कि बस्तर को लोक मान्यताओं का गढ़ माना जाता है. देवधान से संदर्भित लोक मान्यताएं यहां व्याप्त हैं. वैधराज कुलनाथ कुरंदी, सुंदर सेना चोकावाड़ा, छिंदगुर सरपंच बुदरूराम नाग,चांदामेटा के बूटीराम के अनुसार बस्तर को दंडकारण्य कहा जाता है. यहां भगवान राम अपनी धर्मपत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास का अधिकांश समय व्यतीत किए थे. माता सीता देवर लक्ष्मण को पुत्र की तरह मानती थीं. राम और सीता कुटिया में विश्राम करते थे. तब लक्ष्मण प्रहरी बन झोपड़ी के बाहर मुस्तैद रहते थे. वनांचल में हिंसक जीव-जंतुओं और राक्षसों की वजह से लक्ष्मण की सुरक्षा को लेकर माता सीता चिंतित रहती थीं. उन्होंने लक्ष्मण के दीर्घायु होने की कामना करते हुए दंडकारण्य में व्रत रखा और वन में उपजने वाले फल-फूल तथा कंद मूल भगवान भोलेनाथ को अर्पित किया था. यही व्रत कालांतर में खमरछठ या हलषष्ठी के नाम के विख्यात हुआ. पूजा पश्चात माता सीता ने देवधान से तैयार प्रसाद ग्रहण किया था. तब से खमरछठ उपवास रखने वाली माताएं भी जंगली धान के चावल से तैयार प्रसाद ग्रहण करती आ रही हैं.
धीवर महिलाएं एकत्र करती हैं पसहर
ऐसा माना जाता है कि देवधान की लुप्तता के कारण ही जंगली धन को व्रत रखने वाली महिलाओं ने अपनाया. यही जंगली धान अब पसहर के नाम से पहचाना जाता है. परंपरानुसार धीवर जाति की महिलाएं जंगली धान को झड़ाकर तथा चावल निकाल पसहर के नाम से बेचती आ रही हैं.
देवधान पर शोध जारी
बस्तर के सिर्फ दो इलाके के ही औषधीय गुणयुक्त देवधान पाया जाता है. माचकोट वन परिक्षेत्र के रिजर्व फरिस्ट कक्ष क्रमांक 1204 के डोंगाबोड़ना नाला किनारे और कोलेंग वन परिक्षेत्र में चांदामेटा के पास रिजर्व फॉरेस्ट कक्ष क्रमांक 1530 में मासाइझोड़ी नाला किनारे ही देवधान होता है. पर्यावरण प्रेमी हेमंत कश्यप ने बस्तर के दुर्लभ देवधान पर वर्षों तक अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट नवंबर 2022 में इंदिरा गांधी कृषि विवि रायपुर में डॉ दीपक शर्मा, संचालक अनुसंधान सेवाएं को सौंपी थी. कृषि विश्वविद्यालय ने दुर्लभ धान को पंजीकृत कर पीपीव्ही और एफआरए के लिए मेडिसिनल राइस रिसर्च सेंटर नई दिल्ली और लखनऊ भेजा है. वहां विगत दो वर्षों से इसके औषधीय गुणों पर शोध कार्य जारी है.
