एसपी दे रहे माता-पिता को पैरेन्टिंग के टिप्स
विद्यार्थियों को लगातार कर रहे हैं मोटिवेट
पिछले दो महीने में दो दर्जन स्कूल-कालेजों तक पहुंचे
दुर्ग जिला पुलिस अधीक्षक डॉ अभिषेक पल्लव विद्यार्थियों के पथभ्रष्ट होने को लेकर चिंतित हैं. उनका मानना है कि युवाओं का देश भारत यदि अपनी युवा शक्ति को लेकर गंभीर नहीं हुआ तो बात बहुत बिगड़ जाएगी. उनका मानना है कि आज के माता-पिता अपनी जिम्मेदारी को भूल रहे हैं. वे अपने बच्चों की सभी इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश में परवरिश के महत्व को भूल रहे हैं. वे अपने बच्चों को सुख सुविधा की सारी चीजें तो मुहैय्या कराते हैं पर समय देना भूल जाते हैं. उनकी आंखें तब खुलती हैं जब बच्चा किसी गंभीर संकट में फंस जाता है.
डॉ पल्लव का मानना है कि बच्चों को सही राह दिखाने की जिम्मेदारी माता-पिता की है. यदि वे उन्हें समय नहीं देंगे तो बच्चे उसका विकल्प तलाश लेंगे. आज सभी लोग सोशल मीडिया से सही-गलत ज्ञान हासिल कर रहे हैं. परिवेश सही मिल गया तो बच्चे अच्छा रास्ता चुन लेते हैं वरना उनकी ऊर्जा व्यर्थ के कार्यों में नष्ट हो जाती है. वे गलत लोगों की सोहबत में पड़ जाते हैं, व्यसन का शिकार हो जाते हैं और फिर परिवार और समाज के लिए कंटक साबित होते हैं. इसलिए जब तक बच्चा 12वीं पास न हो जाए, उसे प्रतिदिन 2-3 घंटा समय दें. उसे अकेला न छोड़ें. वह मोबाइल और इंटरनेट का कैसा उपयोग कर रहा है, इसपर भी नजर रखे जाने की जरूरत है.
पिछले दो महीनों में एसपी डॉ पल्लव लगभग दो दर्जन स्कूल कालेजों में बच्चों को मोटिवेट कर चुके हैं. वे विद्यार्थियों को अपने जीवन का उदाहरण देते हैं. वे बताते हैं कि किस तरह एमबीबीएस के प्रथम वर्ष में वे फेल हो गए, पर हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने कड़ी मेहनत की और जब नीट पीजी की परीक्षा दी तो टॉप 50 में उनका सलेक्शन हो गया. उन्होंने देश के शीर्ष मेडिकल संस्थान से एमडी किया. प्रैक्टिस शुरू करने के बाद भी आगे बढ़ने की जिजीविषा कम नहीं हुई. उन्होंने प्रयास जारी रखा और अंततः यूपीएससी की कठिन परीक्षा भी उत्तीर्ण की और आईपीएस हो गए.
डॉ पल्लव ने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि बिहार के नालंदा में विश्व की सबसे पुरानी यूनीवर्सिटी थी. यह एक आवासीय विद्यालय था जहां दूर-दूर से विद्यार्थी पढ़ने आते थे. हमारे पास ज्ञान और शिक्षा की विरासत थी. तब भारत सोने की चिड़िया कहलाता था. पर अपनी शिक्षा को संभाल नहीं पाए. 5वीं शताब्दी के इस विश्वविद्यालय को 12वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी ने ढहा दिया. हमने शिक्षा की विरासत को खो दिया तो अंग्रेजों ने हमें गुलाम बना लिया. इतिहास गवाह कि जो देश शिक्षा और तकनीकी में पीछे रह जाएगा वह हमेशा गुलाम बना रहेगा.
शारीरिक के साथ-साथ मानसिक विकास और सशक्तीकरण की पैरवी करते हुए वे कहते हैं कि बच्चों को पढ़ाई के साथ ही कोई हुनर भी सीखना चाहिए. यह हुनर पेंटिंग, क्राफ्ट, गायन, वादन, भाषण, खेलकूद, कुछ भी हो सकता है. ये हुनर आपके व्यक्तित्व को निखारते हैं. उन्होंने आगाह किया कि जब आप सफल होते हैं, आपके जीवन में सबकुछ सही चल रहा होता है, तब आपके आसपास ढेरों मित्र होते हैं. पर जब आप असफल होते हैं या कोई संकट आता है, तब आप बिल्कुल अकेले होते हैं. ऐसी स्थिति से जो जूझ लेता है वह बहुत आगे निकल जाता है.
डॉ पल्लव कहते हैं कि आज छात्राएं भी छात्रों की बराबरी कर रही हैं. बराबरी की यह कोशिश शिक्षा, खेलकूद या किसी भी हुनर के क्षेत्र में होनी चाहिए. आज महिलाएं प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों को न केवल टक्कर दे रही हैं बल्कि आगे भी निकल रही हैं. पर यह सभी मामलों में सही नहीं है. सिगरेट, हुक्का, शराब, गाड़ी दौड़ाना, रात-रात भर चलने वाली पार्टियों में जाना उन्हें संकट में डाल सकती है. इस विचलन के अपने संकट हैं. इससे न केवल देश की संस्कृति खतरे में है बल्कि यह व्यक्तिगत तौर पर भी छात्राओं के लिए सही नहीं है. यह समाज के लिए बेहद चिंता का विषय होना चाहिए.
विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए वे अकसर कहते हैं कि अपने छात्र जीवन का सकारात्मक दिशा में भरपूर आनंद लें. जितना सीख सकते हैं, सीखें. सकारात्मक लोगों की सोहबत करें. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करें. नकारात्मक लोगों से दूरी बनाएं. यह एक ऐसा युग है जिसमें साधन संसाधनों की प्रचुरता है. लक्ष्य निर्धारित कर कठिन परिश्रम करें तो सफलता निश्चित है. सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता. जितने भी लोग सफल हुए हैं, वे शिखर तक पहुंचने से पहले कई बार असफल हुए हैं. पर हर बार उन्होंने नए सिरे से कोशिश की है, कठिन संघर्ष किया है और तब कहीं जाकर सफलता ने उनके कदम चूमे हैं.
वे कहते हैं कि नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि माता-पिता की कमाई से अच्छे जूते, महंगी गाड़ियां, ब्रांडेड कपड़े, महंगे मोबाइल खरीदना कोई बड़ी बात नहीं है. आनंद तो इसमें है कि हम स्वयं किसी काबिल बनें और ये वस्तुएं अपनी कमाई से खरीद सकें. जो विद्यार्थी कुछ बनना चाहते हैं, वे अपना लक्ष्य निर्धारित करें और उसे प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करें. एक-दो बार असफलता मिल सकती है पर इसे अपनी आदत न बनाएं. जीतने की कोशिश जारी रखें. आज प्रत्येक क्षेत्र में अवसर हैं. आपका कोई न कोई हुनर आपको सफलता के शीर्ष तक अवश्य ले जाएगा.
व्यक्तित्व विकास के टिप्स देते हुए डॉ पल्लव कहते हैं कि छात्र जीवन में उन्हें कभी मंच पर चढ़ने का अवसर नहीं मिला. पर एक बार सफलता मिली तो इतना आत्मविश्वास आ गया कि अब मंच पर खड़े होकर बिना रुके धाराप्रवाह विभिन्न विषयों पर बोल सकते हैं. इसके लिए अपना ज्ञान बढ़ाना होगा, नियमित रूप से अखबार पढ़ना होगा. बच्चे कम से कम हेडलाइंस ही पढ़ें ताकि उन्हें खबर रहे कि देश दुनिया में क्या चल रहा है. उन्होंने कहा कि यदि विद्यार्थी अपने घर पर भी कम से कम पांच मिनट किसी भी विषय पर बोलने का अभ्यास करें तो उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और व्यक्तित्व निखरेगा.
जगह का नहीं पड़ता कोई असर
डॉ पल्लव का मानना है कि हुनर के लिए स्थान कोई महत्व नहीं रखता. आज गांव से भी बड़ी संख्या में डाक्टर, इंजीनियर, सीए और वकील निकल रहे हैं. गांव से निकलकर लोग मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री तक बन रहे हैं. अवसर सबके पास है, जरूरत है तो बस लक्ष्य निर्धारित करने की. स्कूल और कालेज का भी फर्क पड़ता है. किसी स्कूल से निकलकर इक्का-दुक्का लोग सफल होते हैं तो शीर्ष संस्थानों से ज्यादा संख्या में लोग सफल होते हैं. इसका एक कारण हो सकाता है कि ऐसे संस्थानों में अच्छे बच्चों की संख्या अधिक होती है, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण होता है. लक्ष्य बनाएं और ऐसे संस्थानों में प्रवेश का प्रयास करें.
किशोर भी कर रहे हैं आत्महत्या
उन्होंने कहा कि आजकल 13-14 साल के किशोर भी आत्महत्या कर रहे हैं. यह हमारी विफलता है. हम बच्चों को वह नैतिक सहारा नहीं दे पा रहे हैं जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है. अपने ही घर में अलग-थलग हो गए बच्चे परीक्षा का तनाव नहीं झेल पा रहे हैं. कच्ची उम्र में प्रेम प्रसंग में फंस रहे हैं और हताश होकर मौत को गले लगा रहे हैं. उन्होंने कहा कि जीवन कोई 100 मीटर का फर्राटा दौड़ नहीं है. यह एक लंबा मैराथन है जिसमें कई पड़ाव आएंगे. हमें धीरज से आगे बढ़ना होगा और बच्चों को भी इसके लिए मानसिक रूप से तैयार करना होगा.
माता-पिता को दी नसीहत
डॉ पल्लव का मानना है कि पेरेंट्स के लिए बहुत जरूरी है कि वे बच्चों को समय दें. देखें कि बच्चे क्या कर रहे हैं. बच्चों की निगरानी की आवश्यकता नहीं है पर इतना तो जानना ही होगा कि वे मोबाइल का क्या इस्तेमाल कर रहे हैं. यह समय बच्चे के भावी जीवन की नींव है. यदि नींव टेढ़ी मेढ़ी हो गई तो बाद में इसपर बुलंद इमारत कभी नहीं बन पाएगी. बच्चे गलत संगत में पड़ जाते हैं, गलत दिशा में चले जाते हैं, मुसीबतों से घिर जाते हैं तो पेरेन्ट्स दौड़ते हुए पुलिस के पास आते हैं. तब ज्यादा कुछ किया नहीं जा सकता.
