बस्तर के देसी आम पापड़ की मांग बढ़ेगी, रायपुर से हैदराबाद तक जा रहा आमचड़ा
हेंमत कश्यप-जगदलपुर- बस्तर के गांव-गांव में इन दिनों जमकर आम पापड़ तैयार किया जा रहा है. पूरा बस्तर इसे आमचड़ा कहता है. देसी आम से तैयार आमचड़ा की मांग साल दर साल बढ़ती जा रही है. बस्तर के चुस्की देसी आम के बाद अब आमचड़ा भी बस्तर से रायपुर-हैदराबाद तक कई बड़े शहरों तक पहुंच रहा है. जिसके चलते बस्तर में अमचूर के बाद अब आम पापड़ को नया मुकाम मिल रहा है.
बस्तर में आम लगाना पारंपरिक रीति है. “आम लगाओ-अमर हो जाओ” की अवधारणा के साथ ही बस्तर में बा कानून आम रोपने वाले अपने वंशजों के सम्मान में यहां आमा तिहार मानते आ रहे हैं. आम के विकसित होते ही इसे तोड़ और अमचूर बनाकर बेचना पारंपरिक व्यवसाय है, बहरहाल अब देसी आम से आम पापड़ बनाकर बेचने की व्यवसाय को एक नई दिशा मिली है. ग्रामीण जुटाने देसी आमों से छिलका औरगुठलियों को अलग करते हैं. गुदा को मसलते हैं. फिर खाट में प्लास्टिकक्लोथ के ऊपर सूती कपड़ा बिछाकर धूप में सुखाते हैं. फिर सूखे हुए पापड़ को बाकायदा दो फीट लंबा तथा 6 इंच रखकर काट और लपेट कर तथा कुश की रस्सी में बांध कर हाट दलिया में बढ़ते हैं. यह आमचड़ा 200 रूपये प्रति नाग की दर से बिक रहा है. खासकर दक्षिण बस्तर के दलिया में इसका आवक ज्यादा हो रही है.
विशेष प्रशिक्षण जरूरी
ग्राम भोगाम के बल्लू भोगामी बताते हैं कि आमचड़ा बनाना यहां के लोगों का पारंपरिक रीति है, लेकिन सार्वजनिक मांग को देखते हुए यह तेजी से व्यवसाय का रूप ले रहा है. ग्रामीण बेहतर और स्वादिष्ट आम पापड़ बनाकर बेच सके इसके लिए जिला प्रशासन को भी प्रशिक्षण देने की दिशा में कार्य योजना बनानी चाहिए.
देसी स्वाद खूब भा रहा
इधर बारसूर के बिजली बरई बताते हैं कि आमचड़ा आमतौर पर बारसूर, तुमनार, गीदम, दंतेवाड़ा, बचेली दलिया के अलावा नकुलनार, कटे कल्याण के दलिया में ज्यादा बिकता जाता है. एनएमडीसी कर्मियों के अलावा अन्य सरकारी कर्मचारी बड़े शौक से दलिया खाते हैं और अपने मजदूरों को देते हैं. आमचड़ा तेजी से एक व्यवसाय का रूप लिया है. यह अच्छी बात है.
