टेंडर प्रक्रिया में भारी भ्रष्टाचार के आरोप
कांग्रेस-बीजेपी-जनता कांग्रेस की भूमिका संदिग्ध
चहेते ठेकेदार को उपकृत कर मलाई मारने का खेल
पार्ट- 01
रिसाली– नगर निगम रिसाली में 12 करोड़ रूपए के सफाई ठेके को लेकर बड़े भ्रष्टाचार की बात सामने आई है. आरोप लग रहे हैं, कि करोड़ों रुपए के सफाई कार्य के टेंडर में गंभीर अनियमितताएं बरती गई और अपने चहेते ठेकेदार को उपकृत करने के साथ–साथ खुद की जेब भरने एवं मलाई मारने का खेल खेला गया. इस घोटाले में क्या बीजेपी और क्या कांग्रेस और क्या जनता कांग्रेस सभी के सभी हमाम में नंगे हो गए. पता चला है कि इन सब की मिलीभगत से ही नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों ने फाइलें तैयार की और देखते ही देखते करोड़ों- करोड़ का वारा-न्यारा कर दिया. बताते हैं कि केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त दुर्ग ग्रामीण विधानसभा के विधायक ललित चंद्राकर और उनके कथित सिंडिकेट ने मिल जुलकर इतने बड़े घोटाले में संरक्षण का सहारा लिया. और तो और इस मामले में कांग्रेस के सभापति केशव बंछोर की भूमिका बीजेपी के एजेण्ट की तरह है. रिसाली नगर निगम की आयुक्त मोनिका वर्मा, सांसद प्रतिनिधि पप्पू चंद्राकर की भूमिका और भी संदिग़्ध है.
टेंडर प्रक्रिया में भारी अनियमितता का खेल!
इन सभी ने मिलकर अपने चहेते ठेकेदार जहीर खान जो कि जोगी कांग्रेस का प्रमुख सिपहसालार है को दे दिया. बताते हैं कि टेंडर प्रक्रिया में भारी अनियमितता की गई. वर्ना ऐसा कभी नहीं होता कि केवल दो लोगों को ही टेंडर में रखा जाए. लेकिन इन लोगों ने नियम कायदे को ताक पर रख कर केवल दो लोगों में एक न्यूनतम और दूसरा अधिकतम को ही टेंडर में रखा. बाकी को निकाल बाहर किए थे. एक ही काम को योजना अनुसार विभक्त किया गया. रिसाली में 40 वार्ड हैं, जिनमें 10-10 वार्ड में चार टेंडर हुआ इसमें योजना अनुसार 5 लोगों ने रिंग बना लिया था. पहले तीन लोग और दो कंपनी अलग-अलग!
सभापति की भूमिका संदिग्ध!
सभापति केशव बंछोर की लिप्तता और भी अधिक संदिग्ध है. जानकारी के मुताबिक प्रदेश में सत्ता बदलते ही उनका रंग भी बदलने लगा था. बताया जाता है कि बीजेपी के सत्ता में आते ही उन्होंने सांसद प्रतिनिधि दीपक पप्पू चंद्राकर से साठ-गांठ कर लिया था. सभापति केशव बंछोर कांग्रेस के पार्षद हैं. वे अनुभवी हैं. पिछले दो कार्यकाल के बाद तीसरे में नए नगर निगम रिसाली के सभापति नियुक्त हुए. उनसे इस प्रकार के घिनौने खेल में शामिल होने की उम्मीद नहीं थी. आखिर उन्होंने इस काली कमाई की व्यूह रचना में भाग क्यों लिया. अपने निजी हित के लिए सार्वजनिक ठेके में ऐसा भ्रष्टाचार! कमीशन का खेल जोगी कांग्रेस के व्यक्ति को ठेका क्यों दिलाया? सामान्य सभा में सभापति ही सर्वोच्च होता है तो व्यक्तिगत लाभ के लिए उसने राजनीतिक हितों की बलि क्यों चढ़ाई? नगर पालिका अधिनियम 1956 की धाराओं का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है तो केशव बंछोर बैठा कहां हैं? क्या वे भी पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार है. क्या इसके लिए रिसाली क्षेत्र की जनता उसे कभी माफ करेगी?

दुर्ग ग्रामीण विधायक की जवाबदेही क्यों नहीं?
दीपक पप्पू चंद्राकर दुर्ग ग्रामीण विधायक ललित चंद्राकर के बेहद करीबी रिश्तेदार हैं. इसलिए उनकी नगर निगम में खूब चलती हैं. इसी का फायदा उठाकर मलाई मारने के लिए केशव बंछोर, पप्पू चंद्राकर, मोनिका वर्मा और जहीर खान ने एकजुट होकर प्लान बनाया और सफाई ठेका में लंबा हाथ मारने के लिए जहीर को एकतरफा ठेका दे दिया जबकि इतना बड़ा ठेका नियम अनुसार दिया जाना गलत है. यह निगम अधिनियम की भी अवहेलना है. यहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि जो बीजेपी हिंदुत्व की बात करती है उसने इतने बड़े ठेके में क्यों चुप्पी साध ली. इसमें कहां गया हिदुत्व का चेहरा? इससे स्पष्ट होता है कि केवल पैसा कमाने के लिए ही यह गठजोड़ किया गया. यह स्पष्ट है कि पहले सफाई का ठेका 8 करोड़ में होता था जिसमें प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत की वृद्धि होती हैं, तब सवाल है कि 8 करोड़ की जगह 10 प्रतिशत ही बढ़ता लेकिन यह एका- एका डेढ़ गुना यानी 12 करोड़ की बढ़ोत्तरी बताती है कि कहीं न कहीं निहित स्वार्थ को पूरा करने के लिए यानी पैसा कमाने के लिए यह गठजोड़ किया गया. एक तो वैसे ही रिसाली की सामान्य सभा में बहुत सारी खामियां है. दो पार्षद जिनकी मृत्यु हो चुकी है. 1 साल हो गए उनके वार्डों में चुनाव नहीं कराया गया. इसके पहले पार्षदों की खरीद-फरोख्त भी शुरू हुई. इसी टेंडर के समय रिसाली नगर निगम के तीन महिला पार्षद और एमआईसी सदस्य भाजपा में शामिल हो गए. इन पांच पार्षदों में ईश्वरी साहू, सरिता देवांगन एमआईसी सदस्य परमेश्वर देवदास और चंद्रप्रकाश निगम, सारिका साहू ने बीजेपी प्रवेश कर लिया. इसके बाद नगर निगम में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के 20-20 पार्षद हो गए. इससे इन लोगों को भ्रष्टाचार की खुली छूट मिली. यहां यह बताना लाजिमी है कि इनमें परमेश्वर देवदास उर्फ पिंटू पर लोहा चोरी का आरोप भी लगा और इसी आरोप में उसे जेल भी जाना पड़ा. इस प्रकार हम देखें तो एक पूरी की पूरी साठ-गांठ ऐसी दिखाई देती है जिसमें न पार्टी है न नैतिकता है और न ही शहर के विकास के प्रति प्रतिबद्धता. वर्ना कारण क्या था कि शशि सिन्हा जो कि सामान्य गृहणी से मेयर के पद पर पहुंचने वाली महिला को अंधेरे में रखकर या बरगलाकर इन लोगों ने अपना घिनौना खेल खेला.
अधिकारियों को उपयुक्त स्थान क्यों नहीं?
जब नगर निगम रिसाली में उपयुक्त अफसर हैं तो उनके सेवाओं की जगह ऐसे अपरिपक्व लोगों को क्यों महत्वपूर्ण स्थान दिया गया जिससे निगम के कार्य प्रभावित हों? पहले तो स्वास्थ्य विभाग को ही देखें…. धमेंद्र मिश्रा पहले भिलाई नगर निगम में स्वास्थ्य अधिकारी थे वहां से उनका ट्रांसफर दुर्ग नगर निगम में किया गया और फिर वहां से रिसाली नगर निगम भेजे गए. लेकिन यहां उन्हें स्वास्थ्य विभाग न देकर अन्य विभाग में पदस्थ कर दिया गया. क्यों? जबकि स्वास्थ्य अधिकारी अमित चंद्राकर स्वास्थ्य पर्यवेक्षक था क्या इसलिए कि वह विधायक ललित चंद्राकर का रिश्तेदार है? क्या यह विडंबना नहीं कि विधायक आज भी चाह रहें है कि उसकी नियुक्ति लगातार बनी रहे. इसी से भ्रष्टाचार को प्रश्रय मिलता है.
ठेका दस्तावेजों में भारी अफरा-तफरी
एसएलआरएम जो ठोस और तरल संसाधन प्रबंधन का काम करता है वहां भारी अफरा-तफरी का माहौल है. सूत्रों का दावा है कि यहां टेंडर प्रक्रिया का भंडार क्रय अधिनियम का पालन किया जाता है जो कि यहां नहीं हुआ. बताया जाता है कि 12 करोड़ के ठेके में तीन निविदाकार आमंत्रित करने के नियम का पालन नहीं किया गया. इस टेंडर प्रक्रिया का कांग्रेस के पार्षदों ने सामान्य सभा में मामला उठाया पर विपक्षी दल बीजेपी द्वारा टेंडर प्रक्रिया पर सहमति दी गई जिसका कड़ा विरोध सत्ता दल के पार्षदों ने किया और जब वोटिंग की बात आई तब सभापति ने टेंडर प्रक्रिया पर मौन समर्थन दिया और प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हो गया. सवाल है कि सलाहकार समिति में इस प्रस्ताव को क्यों नहीं लाया गया और क्यों सीधे एमआईसी में लाकर अधिकारियों की मिलीभगत और सुनियोजित षड्यंत्र करके बिना दस्तावेज के सामान्य सभा के माध्यम से इतना बड़ा खेला कर दिया. आज वही बीजेपी के पार्षद जो साथ दिए थे, “सफाई नहीं होता” कह कर शिकायत करते हैं!
टेंडर घोटाले की जांच की चुनौती
स्थानीय पार्षदों एवं कुछ जागरुक ठेकेदारों ने 12 करोड़ की इस टेंडर घोटाले की जांच के लिए निगम प्रशासन को चुनौती दी है. उनका कहना है कि इतनी बड़ी राशि और बड़े प्रोजेक्ट में यदि गड़बड़ी हुई है तो इसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है. यहां यह बताना लाजिमी है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूरे प्रदेश में ई-टेंडरिंग की प्रक्रिया जो विस्तारित की थी उससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगने लगा था. लेकिन बाद के दिनों में इस पर हो रही ढिलाई ने स्थिति जस के तस कर दी. आज भी भूपेश बघेल आवाज उठा रहे है लेकिन जिन्होंने भीतर ही भीतर भाजपा से हाथ मिला लिया है उससे किस तरह से आशा की जाए? लेकिन तय है कि समय पर इस तरह के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश अवश्य होकर रहेगा.
पार्ट-02 जल्द ही जारी किया जाएगा.
