मुफ्त योजनाओं से बढ़ते कर्ज पर जताई चिंता
नई दिल्ली- देश में चुनावी मुफ्त योजनाओं (फ्रीबीज) को लेकर बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. मुफ्त सुविधाएं बांटने की प्रवृत्ति पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों की नीतियों पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकारों को मुफ्त बांटने के बजाय रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनता के टैक्स के पैसे का उपयोग सोच-समझकर होना चाहिए. यदि सरकारें बिजली, राशन, गैस और नकद सहायता जैसी योजनाएं बिना दीर्घकालिक वित्तीय योजना के लागू करती हैं, तो इसका सीधा असर राज्य के खजाने पर पड़ता है. अदालत ने यह भी कहा कि विकास कार्यों—जैसे अस्पताल, स्कूल और सड़क निर्माण—की अनदेखी कर मुफ्त योजनाओं पर अधिक खर्च करना संतुलित नीति नहीं है.
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कई राज्यों का बड़ा हिस्सा कर्ज और ब्याज चुकाने में ही खर्च हो रहा है. आंकड़ों के मुताबिक, कई राज्यों में कुल सब्सिडी का बड़ा भाग बिजली सब्सिडी पर खर्च हो रहा है, जिससे वित्तीय दबाव बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो राज्यों के विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं.
राजनीतिक दलों पर भी अदालत ने परोक्ष रूप से टिप्पणी करते हुए संकेत दिया कि चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं की घोषणा करना मतदाताओं को प्रभावित करने का माध्यम बनता जा रहा है. कोर्ट ने कहा कि वास्तविक जरूरतमंदों को सहायता मिलनी चाहिए, लेकिन आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को मुफ्त सुविधाएं देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को जिम्मेदार वित्तीय अनुशासन अपनाने की सलाह दी है और उम्मीद जताई है कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर ठोस दिशा-निर्देश बनाए जाएंगे.
अब देखना यह होगा कि अदालत की इस सख्त टिप्पणी के बाद राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों में क्या बदलाव करते हैं और क्या मुफ्त योजनाओं पर कोई स्पष्ट नीति बन पाती है या नहीं.
