छत्तीसगढ़िया कविता- नशा म ये मनखे मन, चिनहत नइये बेटी-माई!

कोमल कांत यादव (मयारुक)-
नशा म ये मनखे मन, चिनहत नइये बेटी-माई!
डोलय धरती, रोवय अगास।
ये जग के होवत हे बिनास।।
रामनवमी म तोर, दुरगति दुरगा दाई।
कका घलो नइ चिनहिस, अपने बेटी-माई।।
नइ बांचे रिसता-नता, न धरम-करम।
मान-गउन बुड़गे, बेच खाये हे शरम।।
हाहाकार मचगे, चारो-मुड़ा होगे करलाई..
नशा म ये मनखे, चिनहत नइये बेटी-माई..
पढ़ लिख के बड़ होशियार बनत हे।
पोथी पतरा मन म, दियांर परत हे।।
संस्कार- मरजाद, बेच खाये हे रे भाई..
नशा म ये मनखे, चिनहत नइये बेटी-माई..
बड़े-बड़े पोस्टर म छपत हे विकास।
गांव-गांव गली-गली म, मिलत हे लाश।
नियाव के गाड़ी धीरनहा, का होही सुनवाई
नशा म ये मनखे, चिनहत नइये बेटी-माई..
चुन-चुन के बने सियान,करलव धियान।
फांसी चढ़य, अइसन कानुन देवव लान।।
इही म तोर, मोर, सबके बेटी, दाई-माई के भलाई
नशा हवस म झन होवय, लचार हमर बेटी-माई
नारी म का जवान, का सियान।
होत लइका के घलो, मरे बिहान।।
नशा म ये मनखे मन, चिनहत नइये बेटी माई..
बहुत होगे जोर जुलुम, अब जागव कंकाली दाई..
नोनी ल भावपूर्ण श्रद्धांजलि,
मांग- अपराधी ल तत्काल फांसी होय…
बलात्कारी बर फांसी के कानुन पारित करय..
असन पुरा भारत म देखावा के देवी उपासना/पुजा सार्वजनिक रूप ले बंद कर दय!
नशाखोरी शराबबंदी कानुन मजबुत करय!
कोमल कांत यादव (मयारुक), संयोजक: आखर झाँपि (लोक साहित्य), ग्राम टोनाटार
