सूर्योदय के पहले धान बीज लेकर खेत पहुंचते हैं किसान

हेमंत कश्यप/जगदलपुर- देशवासियों की तरह बस्तर का आदिवासी समाज भी अक्षय तृतीया को अक्ती तिहार के रूप में मनाता है. यहां के किसान इस दिन धान बोने की शुरुआत करते हैं, किंतु उनकी धान बोनी और फसल को किसी की नजर न लगे इसलिए सूर्योदय के पहले मुंह अंधेरे ही खेत पहुंच धान बोनी कर आते हैं. इतना ही नहीं कितना बड़ा भी किसान हो वह अपने खेतों में बैलों को हल में जोत जरूर चलाता है, चूंकि खेतों में बैलों का खूर लगना शुभ माना जाता है.
बस्तर संस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध हैं. यहां की परंपराएं भी अद्भुत है. अक्षय तृतीया के दिन यहां के किसान बांस की नई टोकरी से कावड़ बनाते हैं और उसके एक तरफ अमलतास के फूल और पूजन सामग्री तो दूसरी तरफ की टोकरी में धान बीज रखते हैं. बताया गया कि ग्रामीण ऐसा वह इसलिए करते हैं कि धान बोने की उनकी प्रक्रिया को कोई दूसरा न देखें और फसल को नजर न लगे. यह परंपरा वर्षों से बस्तर में व्याप्त है.
नजर से बचाने तड़के बोनी रामपाल के सुमन सिरहा बताते हैं कि अक्षय तृतीया को बस्तरवासी भी धान बोनी के लिए सबसे बढ़िया दिन मानते हैं. किंतु जादू – टोना और अंधविश्वास से गिरा बस्तर अपनी कई परंपराओं को आज भी जिंदा रखे हुए हैं. अक्षय तृतीया के दिन सूर्योदय के पहले खेत पहुंचना और कोई देखे. उसके पहले धान बोनी कर घर आ जाना. उनकी परंपरा में शामिल है. लोग मान्यता है कि धान बीज लेकर खेत जाते समय अगर कोई व्यक्ति रोक लेता है या पूछ बैठता है कि कहां जा रहे हो, तो वह धान बीज पूरी तरह अंकुरित नहीं होता और भरपूर फसल भी नहीं होती. इस रोका- टोकी के अपशकुन से बचने के लिए ही गांव वाले मुंह अंधेरे खेत पहुंच तथा धान बोनी कर लौट आते हैं.
