मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश सुनाते हुए हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें मदरसा एक्ट को असंवैधानिक बताया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा-यूपी मदरसा एक्ट के सभी प्रावधान मूल अधिकार या संविधान का उल्लंघन नहीं करते हैं. यूपी में लगभग 16हजार मदरसे हैं.कोर्ट के फैसले से करीब 17 लाख मदरसा छात्रों को राहत मिली है.
हालांकि, न्यायालय ने माना कि मदरसा अधिनियम, जिस हद तक ‘फाज़िल’ और ‘कामिल’ डिग्रियों के संबंध में उच्च शिक्षा को विनियमित करता है, वह यूजीसी अधिनियम के विपरीत है और उस हद तक यह असंवैधानिक है.
यूपी मदरसा एक्ट: वैध है या अवैध ? सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (5 नवंबर, 2024) को इस मामले पर बड़ा फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के (22 मार्च 2024) फैसले को पलटते हुए यूपी मदरसा एक्ट की संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए मान्यता दी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने यूपी मदरसा बोर्ड एक्ट को संविधान के मौलिक ढांचे के खिलाफ बताते हुए सभी छात्रों का दाखिला सामान्य स्कूलों में करवाने का आदेश दिया था. सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जस्टिस की बेंच ने कहा कि यह सही नहीं था.
‘किसी भी छात्र को धार्मिक शिक्षा के लिए नहीं किया जा सकता बाध्य’
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिए फैसले में कहा कि राज्य सरकार शिक्षा को नियमित करने के लिए कानून बना सकती है. इसमें सिलेबस, छात्रों का स्वास्थ्य जैसे कई पहलू शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मदरसा मजहबी शिक्षा भी देते हैं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य शिक्षा ही है. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि किसी भी छात्र को धार्मिक शिक्षा के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है.
मदरसों की डिग्री को यूपी सरकार ने SC में बताया था अमान्य
यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा था कि यूपी मदरसा बोर्ड के जरिए दी जाने वाली कामिल और फाजिल डिग्री न यूनिवर्सिटी की डिग्री के समकक्ष है और न ही बोर्ड की ओर से पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों के समकक्ष हैं. इस स्थिति में मदरसे के छात्र उन्हीं नौकरियों के लिए योग्य हो सकते हैं, जिनके लिए हाई स्कूल/इंटरमीडिएट योग्यता की जरूरत होती है.
