विस चुनाव में उतार दिए 21 सांसद
कहीं यह 2024 की तैयारी तो नहीं
दीपक रंजन दास : भारतीय जनता पार्टी ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर एक ऐसा दांव खेला है जिससे राजनीतिक विश्लेषक तक चकित हैं. पार्टी ने इन राज्यों में अब तक अपने 21 सांसदों को चुनाव मैदान में उतार दिया है. इसके साथ ही अटकलों का बाजार गर्म हो गया है. कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी का अपनी राज्य इकाइयों पर से भरोसा उठ चुका है. स्थानीय नेताओं की वोट हासिल करने की क्षमता को लेकर भी सशंकित है. इसलिए सांसदों को मैदान में उतार कर वह विधानसभा चुनावों को राष्ट्रीय राजनीति से प्रभावित करना चाहती है. जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस रणनीति के पीछे की असली वजह क्या है.
इन विधानसभा चुनावों को इतनी गंभीरता से लेने के पीछे एक ठोस वजह है. राष्ट्रीय स्तर पर जहां भाजपा की कोई काट अभी दूर-दूर तक नजर नहीं आती वहीं राज्यों में उसकी स्थिति के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. 2014 में जब नरेन्द्र मोदी ने पहली बार सरकार बनाई थी, उस समय देश के सात राज्यों में भाजपा की सरकार थी. ये राज्य थे गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गोवा. पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी के साथ वह सत्ता की साझेदार थी. 2018 में जब भाजपा अपने चरम पर थी तब 21 राज्यों में भाजपा या उसकी सहयोगी पार्टियों की सरकारें थी. पर स्थिति तेजी से बदली और अब सिर्फ 14 ऐसे राज्य हैं, जहां भाजपा या उसके गठबंधन की सरकार है.
अर्थात पिछले कुछ वर्षों में सात राज्य भाजपा के हाथ से जाते रहे हैं. भाजपा ने इस स्थिति का आकलन किया है और एक ठोस नतीजे पर पहुंच चुकी है. वह इस स्थिति को बदलना चाहती है. स्थानीय नेताओं के वोट हासिल करने की क्षमता को लेकर वह संतुष्ट नहीं है. इसलिए वह राज्यों में नया नेतृत्व पैदा करने की कोशिश करेगी. विशेषज्ञ इसके पीछे तीन अन्य कारण मानते हैं. पहला, इससे सांसदों की लोकप्रियता का अंदाजा हो जाएगा. दूसरा, वोटरों को भी यह संदेश जाएगा कि भाजपा इन चुनावों को लेकर कितना गंभीर है. तीसरा, विधानसभा चुनाव में केन्द्र की झलक ही भाजपा का बेड़ा पार लगा सकती है.
सीधी टक्कर और तीसरी ताकतें
पिछले कुछ चुनावों में भी एक ट्रेंड लगभग साफ हो चुका है. वोटर अब स्पष्ट जनादेश और स्पष्ट प्रतियोगिता तय कर देते हैं. पश्चिम बंगाल में 86 फीसदी वोट तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच बंटे थे जबकि मैदान में कांग्रेस और लेफ्ट भी थे. इसी तरह कर्नाटक में उसका सीधा मुकाबला कांग्रेस से था. दोनों दलों के बीच यहां 80 फीसदी वोटों का बंटवारा हुआ था जबकि मैदान में जनता दल सेकुलर और दूसरी कई छोटी-मोटी पार्टियां भी थीं. हिमाचल में भी 87 प्रतिशत वोट कांग्रेस और भाजपा के बीच बंटे थे जबकि आम आदमी पार्टी और दूसरे उम्मीदवार भी मैदान में थे. गुजरात में आप ने हाई वोल्टेज चुनाव लड़ा था फिर भी 80 फीसद वोट भाजपा और कांग्रेस के बीच बंटे थे. उत्तर प्रदेश में 75 फीसद वोट भाजपा और समाजवादी गठबंधन के बीच ही बंटे थे जबकि मैदान में बसपा और कांग्रेस जैसे दल भी थे.
राज्यों में केन्द्र जैसी स्थिति की ख्वाहिश
राज्यों में क्षेत्रीय दलों का बड़ा प्रभाव होता है. उनकी सीधी टक्कर किस पार्टी से होगी, यही सुनिश्चित कर देती है कि हार या जीत किसकी होगी. राज्यों में न केवल क्षेत्रीय पार्टियों का बोलबाला होता है बल्कि नवोदित राष्ट्रीय पार्टियां भी वहां ज्यादा जोर लगाती हैं. जहां तक राष्ट्रीय राजनीति का सवाल है, सभी दलों या उनके समूह का सीधा मुकाबला भाजपा से है. भाजपा चाहती है कि राज्यों में भी यही स्थिति हो. इसलिए उसने अपने सांसदों को मैदान में उतारने की रणनीति बनाई है. इससे विधानसभा चुनावों में केन्द्र सरकार की झलक साफ दिखाई देने लगेगी. यह “वन नेशन-वन इलेक्शन” के भी अनुकूल होगा. इससे पहले भाजपा “मेरी माटी, मेरा देश” अभियान के जरिए भी देश की जनता को सीधे केन्द्र सरकार से जोड़ने की कोशिशें कर चुकी है.
इसलिए पैदा हुई यह स्थिति
जब किसी पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व विशाल आकार ग्रहण कर लेता है तो उसकी छांव में अन्य नेताओं का कद बहुत छोटा हो जाता है. भाजपा में भी नरेन्द्र मोदी का व्यक्तित्व इतना बड़ा हो चुका है कि शेष नेताओं के होने तक का अहसास नहीं होता. अधिकांश सांसदों को वहां पड़े-पड़े जंग लग रहा था. उन्हें 2024 के चुनावों के लिए तैयार रखने का सबसे आसान तरीका यही था कि उन्हें विधानसभा चुनावों में उतर दिया जाए. यदि वे अपना जंग झड़ाने में सफल रहे तो न केवल पार्टी विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर पाएगी बल्कि लोकसभा के लिए भी पूरी तरह तैयार हो जाएगी. भाजपा वैसे भी विधानसभा चुनावों में भी प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज को लेकर ही मैदान में है.
छत्तीसगढ़ में स्थिति अलग
छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम में एक साथ चुनाव होने हैं. इनमें से मध्यप्रदेश में सरकार के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी फैक्टर काम करता प्रतीत हो रहा है. भाजपा ने यहां अपने सात सांसदों को मैदान में उतारा है. छत्तीसगढ़ में स्थिति अलग है. यहां पिछले चुनाव में भाजपा का एक तरफा सफाया हो गया था. उसके अधिकांश कद्दावर चुनाव हार गए थे. भाजपा यहां अब तक चार सांसदों को टिकट दे चुकी है, यहां भी अधिकांश नेताओं को पिछले लगभग पांच सालों में जंग लग चुका है, इनमें जान फूंकने के लिए भी केन्द्रीय और क्षेत्रीय नेताओं का घालमेल जरूरी था. पर पार्टी ने यह सावधानी भी बरती है कि अधिकांश पुराने चेहरों पर भरोसा किया गया है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही असली मुकाबला है. अन्य दलों की उपस्थिति नाम मात्र ही रहेंगी.
