देश का चौथा बड़ा विश्वविद्यालय भी छत्तीसगढ़ में

आज हम बात करने जा रहे हैं भारत की उस प्राचीन धरोहर की जहां न केवल तत्कालीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था बल्कि जहां व्यापार एवं परिवहन सेवाएं भी विकसित रूप में विद्यमान थीं. इस महानगर का नाम था श्रीपुर (अब सिरपुर). 11वीं शताब्दी के भूकम्प और इसके बाद 13वीं शताब्दी में आई भीषण बाढ़ ने इस महानगर को जमींदोज़ कर दिया. 1999 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यहां धरती में समा गई एक पूरी सभ्यता का पता लगाना शुरू किया और लाल ईंटों से बने लक्ष्मण मंदिर का पता लगाया. अब तक हुई खुदाई में इस धरोहर का केवल 20 प्रतिशत भाग ही अनावृत हुआ है. अफसोस की विश्व धरोहर की श्रेणी की यह पुरा सम्पदा अब तक राज्य संरक्षित धरोहर की श्रेणी में शामिल नहीं हो पाई है. उलटे सिरपुर महोत्सव जैसे आयोजनों के चलते यहां जहां तहां अवैध कब्जे हो चुके हैं जो इसके यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की राह में सबसे बड़ी बाधाएं हैं.
धरती पर अनेक सभ्यताओं का विकास हुआ है. अनेक धर्म और जातियों, अनेक संस्कृतियों ने जन्म लिया है. युद्ध और शांति के कई दौर सृष्टि ने देखे हैं. भारतीय महाद्वीप के अनेक राष्ट्र कभी मौर्यकालीन भारत का हिस्सा हुआ करते थे. इनमें अफगानिस्तान, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका प्रमुख हैं. ईसापूर्व छठी शताब्दी से सातवीं शताब्दी के मध्य भारत सबसे अधिक समृद्ध हुआ करता था. अनेक विदेशी विद्यार्थी अध्ययन के लिए भारत आते थे. चीनी यात्री फाह्यान और व्हेनसांग प्रमुख इनमें प्रमुख थे जिन्होंने यहां की कई बातों का उल्लेख अपने ग्रंथों में किया है.
विश्व के चार प्रसिद्ध विश्वविद्यालय- नालंदा, सिरपुर, तक्षशिला और विक्रमशिला भारत में ही थी. विभाजन के बाद तक्षशिला पाकिस्तान में चला गया. नालंदा भारत आज भी बिहार राज्य में खड़ा है. देश का दूसरा सबसे बड़ा विश्वविद्यालय श्रीपुर में था. 11 वीं शताब्दी के भयंकर भूकंप और तेरहवी शताब्दी में महानदी में आई विनाशकारी बाढ़ में तत्कालीन दक्षिण कौशल (वर्तमान छत्तीसगढ़) राज्य की राजधानी रहा श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर) जमींदोज हो गया. विद्यार्थियों की संख्या के हिसाब से श्रीपुर देश का दूसरा सबसे बड़ा विश्वविद्यालय हुआ करता था. यहां कम से कम 10 हजार विद्यार्थी अध्ययन करते थे. भारत के अन्य 40 विश्व विरासतों की तुलना करें तो पाएंगे कि सिरपुर उनमें सबसे श्रेष्ठ है. दुनिया में कहीं भी इतनी विकसित सभ्यता और संस्कृति संपन्न नगर छठवीं शताब्दी में नहीं था, जहां भू और जल मार्ग से व्यापार की गतिविधियाँ संचालित थी और नालंदा के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा विश्विद्यालय भी यहीं था जिसमें विदेशों से भी विद्यार्थी आते थे. इतिहासकारों का मानना है कि देश का चौथा विश्वविद्यालय भी छत्तीसगढ़ के केशकाल की पहाड़ियों में था. नारायणपाल का विष्णु मंदिर प्रमाण है तत्कालीन वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत का. पुरातत्व विभाग को इस क्षेत्र में गहन सर्वेक्षण करना चाहिए.
25 साल पहले शुरू हुआ सर्वेक्षण
राज्य पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और संस्कृति विभाग ने 1999 से 2004 तथा 2007 से 2011 तक सिरपुर की खोई वैभव का पता लगाने के प्रयास शुरू किये. खुदाई कार्य आरंभ होने के बाद कहीं जाकर दुनिया को पता चला कि महानदी के तट पर लगभग 8 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक राजधानी नगर है. यहां 12 से ज्यादा विहार (विद्यालय), लक्ष्मण मंदिर, गधेश्वर महादेव मंदिर, जैन मंदिर और अनेक भग्न मंदिर, मूर्तियाँ, स्तूप, हाट बाजार, नदी परिवहन तट और विरासतें प्राप्त हो चुकी हैं. यहां जमींदोज़ विरासत का यह केवल 20 फीसद हिस्सा है. धरती के गर्भ में समाए शेष स्थलों पर से परदा उठना अभी बाकी है. वर्तमान में लक्ष्मण मंदिर सहित 34 विरासतों का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा और दो विरासतों का संरक्षण राज्य पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग द्वारा किया जा रहा है.
2014 में शुरू हुई विकास की पहल
छत्तीसगढ़ के गठन के बाद 2014 में पहली बार सरकार ने महसूस किया कि इस स्थान को निवेश क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए. लंबी प्रशासनिक कवायद के बाद 2015 में आसपास के 34 गाँवों को मिलाकर इसे सिरपुर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण घोषित कर दिया गया. 2017 में इसकी सीमा तय कर अधिसूचना जारी कर दी गई. अब पहली बार सरकार ने साडा अध्यक्ष के रूप में एक अशासकीय अध्यक्ष की नियुक्ति की है. जिला कलेक्टर को उपाध्यक्ष बनाते हुए अन्य नौ जिला स्तरीय अधिकारियों को विशेष प्राधिकार समिति का हिस्सा बनाया है. स्वीकृत सेटअप पर नियुक्तियों भी प्रारंभ कर दी गई हैं.
लाल ईंटों से बना प्राचीनतम मंदिर
1999-2004 की खुदाई में यहां लाल ईंटो से बना इकलौता और अद्भुत कारीगरी का नमूना लक्ष्मण मंदिर सामने आया था. यह एक मात्र संरचना है जो साबुत है. इसका थोड़ा बहुत प्रचार करने के अलावा राज्य के पर्यटन विभाग ने यहां एक रिसार्ट की स्थापना है. इसके साथ ही पर्यटक सूचना केन्द्र का भवन और होर्डिंग्स लगाए गए हैं. पर आधुनिक तकनीकों से यहां मौजूद संरचनाओं को जाँचने परखने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं की गई.
राज्य विरासत घोषित करने का फैसला
“सिरपुर” एक विश्व विरासत है और भारत के महत्वपूर्ण विरासतों में से एक है. इसको यह दर्जा दिलाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कम से कम तीन बार प्रयास किया है. लेकिन समन्वय की कमी और राज्य तथा केन्द्र सरकारों की अरुचि के कारण यह आज भी उपेक्षा का शिकार है. विश्व विरासत में शामिल होने की पहली शर्त यही है कि धरोहर स्थल राज्य विरासत स्थलों में शामिल हो. अब तक सिरपुर को न तो देश के बौद्ध सर्किट में शामिल किया गया है न ही केन्द्र और राज्य के पर्यटन केन्द्र के रूप में इसे प्रचार प्रसार ही मिला है. अब जाकर भूपेश सरकार ने एक मास्टर प्लान तैयार करने की दिशा में मजबूत कदम उठाये हैं. कोशिशें जारी हैं कि सिरपुर क्षेत्र को विरासत के नक्शे में लाया जा सके. साथ ही राज्य सरकार ने इसे राज्य विरासत का दर्जा देने का फैसला भी कर लिया है.
