क्या है समाधान

भिलाई- इस इस्पात संयंत्र के निर्माता देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे औद्योगिक तीर्थ कहा था. यह संयंत्र मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल का सपना था. किंतु वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पंडित नेहरू के औद्योगिक तीर्थ को बर्बाद करने में संयंत्र एवं सेल प्रबंधन कोई कसर नहीं छोड़ रहा है. वर्तमान में हाउसों की लीज समस्या के साथ ही खस्ताहाल चिकित्सा व्यवस्था को भी अधिकारी और कर्मचारी वर्ग आंदोलित है. संयंत्र के विभिन्न खदानों की टाउनशिप उजड़ चुकी है, अस्पताल और स्कूल बंद हो चुके हैं और अब भिलाई की टाउनशिप और शिक्षा, चिकित्सा व्यवस्था बर्बादी की ओर है.
छत्तीसगढ़ के औद्योगिक और आर्थिक विकास की रीढ़ कहा जाने वाला भिलाई इस्पात संयंत्र जो आज भी औद्योगिक शांति और उत्पादन के लिए देश में सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव पाता है, सेल का सर्वश्रेष्ठ उपक्रम भिलाई इस्पात संयंत्र वर्तमान मेंअपने कर्मियों, अधिकारियों एवं स्थानीय रहवासियों के बीच अपनापन खो रहा है. इसका प्रमुख कारण है शिक्षा, चिकित्सा एवं आवास के मामले में संयंत्र प्रबंधन कीउदासीनता के कारण अत्यंत जर्जर स्थिति में हो जाना. आज स्थिति यह है कि संयंत्र के हजारों आवास प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों एवं अवैध कब्जा धारियों के कब्जे में है. वहीं संयंत्र कर्मचारी अच्छे आवास के लिए भटक रहे हैं. प्रिंसिपल इंपलॉयर होने के कारण संयंत्र प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि वह ठेका मजदूरों के लिए भी आवास, चिकित्सा और शिक्षा की सुविधा प्रदान करें. लेकिन जब स्थाई कर्मचारियों को ही लावारिस छोड़ दिया गया हो तब ठेका मजदूरों की सुविधाओं और परिधीय विकास की बात गौण हो जाती है. संयंत्र में आज स्थाई कर्मचारियों की संख्या लगभग 14 हजार है. पूर्व में लगभग 45,000 कर्मचारी स्थाई थे. इसी कारण ठेका मजदूरों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है और इसी के साथ स्थाई एवं ठेका मजदूरों की उपेक्षा और शोषण भी चरम पर पहुंच गया है. यही कारण है कि विभिन्न यूनियनों के माध्यम से मजदूर वर्ग आंदोलित हो रहे हैं और सेल में सबसे मजबूत संगठन कहे जाने वाले संयंत्र के ऑफिसर्स एसोसिएशन के लिए आंदोलनमें उतरना पड़ रहा है. सर्वाधिक उत्पादन एवं लाभ देने वाले भिलाई इस्पात संयंत्र के अधिकारी और कर्मचारी भी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं तो निश्चित ही आक्रोश सड़क पर आएगा.
वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत भी नहीं होगा कि सभी वर्ग का आक्रोश संयंत्र की उत्पादन पर विपरीत प्रभाव डालेगा और यह स्थिति ना केवल भिलाई बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश के लिए नुकसान दायक होगी. इस इस्पात संयंत्र के निर्माता देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू नेइसे औद्योगिक तीर्थ कहा था. यह संयंत्र मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल का सपना था. किंतु वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पंडित नेहरू के औद्योगिक तीर्थ को बर्बाद करने में संयंत्र एवं सेल प्रबंधन कोई कसर नहीं छोड़ रहा है. वर्तमान में हाउसों की लीज समस्या | के साथ ही खस्ताहाल चिकित्सा व्यवस्था को भी अधिकारी और कर्मचारी वर्ग आंदोलित है. संयंत्र के विभिन्न खदानों की टाउनशिप उजड़ चुकी है, अस्पताल और स्कूल बंद हो चुके हैं और अब भिलाई की टाउनशिप और शिक्षा, चिकित्सा व्यवस्था बर्बादी की ओर है. इस बीच स्थिति में सुधार हेतु कुछ बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों की ओर से कुछ सुझाव भी दिए जा रहे हैं. जिन पर सेल प्रबंधन राज्य और केंद्र सरकार अमल करें तो ना केवल पंडित नेहरू के आधुनिक तीर्थभिलाई को पुनः सुव्यवस्थित और सुसज्जित किया जा सकता है बल्कि खदान क्षेत्रों को भी नया जीवन प्रदान किया जा सकता है.
भिलाई के कुछ जागरूक चिकित्सकों एवं बुद्धिजीवियों ने संयंत्र की चिकित्सा व्यवस्था में सुधार एवं उन्नयन की दृष्टि से संयंत्र के सेक्टर-9 स्थित पंडित जवाहरलाल नेहरु चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र को पीजीआई का दर्जा देने की मांग की है. युवा नेता रितेश मिश्रा के नेतृत्व में विभिन्न क्षेत्रों में जाकर इस मांग को बल देने के लिए जन जागरण अभियान भी चलाया जा रहा है. टाउनशिप की स्थिति सुधारने के लिए संयंत्रका आफिसर्स एसोसिएशन भी आगे आया है और एसोसिएशन को संयंत्र की विभिन्न यूनियनों का समर्थन और सहयोग भी मिल रहा है. इस संबंध में सार्वजनिक उपक्रम बचाओ समिति के संयोजक एवं श्रमिक नेता प्रभुनाथ मिश्रा ने छत्तीसगढ़ आजतक से चर्चा करते हुए कहा कि भिलाई मांगे पीजीआई के आंदोलन को तेज करने के साथ ही खदान क्षेत्रों के उन्नयन की दिशा में तकनीकी महाविद्यालय की स्थापना और इन क्षेत्रों में बंद हुए स्कूलों तथा अस्पतालों को नया जीवन देने के लिए सभी मजदूर संगठन तथा क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को आगे आना होगा.
संयंत्र की दल्ली राजहरा, नंदिनी एवं बिलासपुर स्थित हिर्री खदान में लगातार तीन दशक तक आयरन ओर एवं डोलोमाइट काउत्खनन करने वाले कोड़ेकसा माइनिंग के डायरेक्टर एवं प्रसिद्ध समाजसेवी शांतिलाल जैन का कहना है कि प्रदेश के माइनिंग उद्योग को उन्नत बनाने का स्थानीय युवाओं को माइनिंग क्षेत्र में अपनी प्रतिभा निखारने उन्हें अवसर देने के लिए देश की सबसे बड़ी लौह अयस्क खदान राव घाट को दृष्टिगत रखते हुए दल्ली राजहरा में घनबाद (बिहार) की तर्ज पर माइनिंग स्कूल की स्थापना की जाए. रावघाट खदान की उपयोगिता को देखते हुए रेल सुविधाओं के विस्तार का कार्य किया जा रहा है, जो स्वागत योग्य है. लेकिन इस अंचल के युवाओं को उचित शिक्षा- दीक्षा नहीं मिला और उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं की गई तो रावघाट से पर्याप्त मात्रा में लौह अयस्क का उत्खनन सभव नहीं हो सकेगा.
यहां यह उल्लेखनीय है कि भिलाई इस्पात संयंत्र को रावघाट से उत्खनन की स्वीकृति सन् 1975 में ही मिल चुकी थी, लेकिन दल्ली राजहरा से ही अयस्क की आपूर्ति हो जाने से संयंत्र प्रबंधन ने रावघाट से उत्खनन के लिए वह सक्रियता नहीं दिखाई जो अपेक्षित थी. दल्ली राजहरा माइंस के खाली हो जाने से रावघाट की ओर संयंत्र प्रबंधन का ध्यान अवश्य गया है, लेकिन नक्सल समस्या के कारण संयंत्र प्रबंधन रावघाट में खनन प्रक्रिया को गति देने में असफल हो रहा है और निजी ठेकेदार भी इस क्षेत्र में प्रवेश करने से डर रहे हैं. पिछले दो दशकों के दौरान अब तक संयंत्र को रावघाट से मात्र सवा लाख टन लौह अयस्क की आपूर्ति हो सकी है, जबकि खदान की सुरक्षा एवं रखरखाव में अब तक 400 करोड़ से अधिक की राशि खर्च हो चुकी है. बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती का खर्च भी संयंत्र प्रबंधन को उठाना पड़ रहा है. जानकारों का मानना है कि दल्ली राजहरा में धनबाद की तरह माइनिंग स्कूल की स्थापना क्षेत्र की उन्नति के साथ ही स्थानीय युवाओं को आधुनिक माइनिंग तकनीकी से जोड़नेतथा क्षेत्रीय जनमानस को भी आकर्षित करने में मिल का पत्थर साबित होगा. इसके साथ ही शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधाएं बढ़ाने के लिए भी युद्ध स्तर पर कार्य होना चाहिए. यदि प्रदेश के माइनिंग क्षेत्र को उन्नत और मजबूत बनाने के लिए आधुनिक तकनीकएवं सुविचारित योजनाओं के तहत प्रयास किया जाए, तो प्रदेश का माइनिंग राजस्व दोगुना हो जाएगा. इससे राज्य सरकार को भी हजारों करोड़ रुपए का प्रति वर्ष राजस्व मिलेगा.
प्रदेश में लौह अयस्क, कोयला, लाइम स्टोन, डोलोमाइट, क्वारजाइड, बॉक्साइट जैसे मूल्यवान और तमाम खनिजों का अकूत भंडार है. प्रदेश में दर्जनों सीमेंट कारखाने और उनके माइंस है. यदि सरकार द्वारा माइनिंग क्षेत्रों में 30 फ़ीसदी माइनिंग मेनुअल कार्य के लिए आरक्षित कर दी जाए तो हजारों- लाखों मजदूरों को रोजगार मिलेगा. जिससे बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक दूर हो जाएगी. प्रदेश में खनिज भंडार और माइनिंग उद्योग को ध्यान में रखते हुए माइनिंग स्कूल की स्थापना अत्यंत आवश्यक है. प्रदेश में एम्स और आईआईटी की स्थापना हो चुकी है, लेकिन सबसे अधिक राजस्व और रोजगार देने वाले माइनिंग क्षेत्र को अनदेखा किया गया है. घनबाद जैसे आधुनिक और उच्च गुणवत्ता के माइनिंग शिक्षण संस्थान की स्थापना प्रदेश में माइनिंग क्षेत्रों की विकास और सरकार को राजस्व आय की दृष्टि से नई ऊंचाई प्रदान करेगी. वास्तव में औद्योगिक एवं माइनिंग क्षेत्र में संपन्न होने के बावजूद छत्तीसगढ़ प्रदेश अब तक देश के अन्य राज्यों की तुलना में उन्नत और अग्रणी राज्य नहीं बन पाया है. उसके पीछे आधुनिक तकनीकी शिक्षा और सही योजनाओं के प्रति शासन-प्रशासन की उदासीनता ही जिम्मेदार मानी जाएगी.
