जनता पर जुल्म कारपोरेट्स पर मेहरबानी
रुपया भी गिरा और निर्यात भी, 40 लाख करोड़ के बजट का हासिल क्या?
वित्तीय वर्ष की शुरुआत में केंद्र सरकार को जितना खर्च आबंटित किया गया था, वो सारा पैसा खर्च करने के बाद आज अतिरिक्त पैसा मांगने सरकार फिर इस सदन में आई है. काश ये सुविधा देश के आम आदमी के पास भी होती, जो महीने की 25 तारीख को अपना बटुआ खाली देखकर 5 दिन संघर्ष करके 1 तारीख आने का इंतजार करता है.

सप्लीमेंट्री डिमांड फार ग्रांट्स दो चीजों में से एक अवश्य दर्शाता है. पहली चीज क्योंकि सरकार को अतिरिक्त पैसों की जरुरत पड़ी तो पहली चीज यह है कि जब वित्तीय वर्ष की शुरुआत में सरकार को पैसा चाहिए था तो सरकार ने अपना जो वित्तीय बजट था, उसे अंडर एस्टीमेट कर प्रजेंट किया ताकि वित्तीय घाटे को सुंदर करके उसका सौंदर्यीकरण करके दिखाया जाए. अगर यह नहीं तब दूसरी स्थिति अवश्य होगी कि सरकार ने अपना बजट पूरी तरीके से मिसमैनेज कर दिया. इन दोनों में से यदि कोई एक स्थिति होगी, उसी में सरकार को एडिशनल पैसे के अतिरिक्त खर्चे की जरुरत पड़ रही है. अतिरिक्त पैसे के लिए सरकार इस सदन में आई है, कोई बात नहीं. उसमें चर्चा होगी, लेकिन चर्चा 2 और विषयों पर होनी चाहिए. पहला विषय यह है कि वित्तीय वर्ष की शुरुआत में 40 लाख करोड़ का जो भारी भरकम बजट इस सदन ने सरकार को सेंक्शन किया था, उस 40 लाख करोड़ को खर्च करके सरकार ने क्या पाया? क्योंकि भारत के आर्थिक इंडिकेटर्स संकट का अलार्म बजा रहे हैं.
दूसरा सवाल यह है कि आज से 2-3 महीने बाद जब यहां से सौ मीटर दूर नार्थ ब्लाक में आने वाले वित्तीय वर्ष का बजट बन रहा होगा, उस पर सवाल उठाना भी लाजिमी है. आज इस बहस में मैं चाहूंगा कि आने वाले वित्तीय वर्ष के बजट की भी नींव रखी जाए. मैं एक सुझाव और देना चाहूंगा. हम सारे लोग बजट पर चर्चा उसी समय करते हैं, जब बजट प्रस्तुत किया जाता है. हमें बजट पर 2 बार चर्चा करनी चाहिए. एक बार जब बजट प्रस्तुत हो और विंटर सेशन में 7-8 महीने बीतने के बाद चर्चा हो कि बजट से देश को हासिल क्या हुआ, क्या मिला? कितनी नौकरियां मिलीं और क्या बेरोजगारी और महंगाई की दर कम हुई? आज सरकार 3,25,775 करोड़ मांगने इस सदन के भीतर आई है. मैं वित्त मंत्री और सदन का ध्यान ये पैसे सेंक्शन करने के पहले 8 बड़ी बीमारियां, जिससे आज देश की अर्थ व्यवस्था पीड़ित है, बीमार है, उसकी तरफ करना चाहता हूं.
रोजगार पैदा करने का दावा फुस्स
पहली बड़ी बीमारी है बेरोजगारी. इस सरकार ने चुनावों से पहले वादा किया था. भाजपा ने वादा किया था कि हम 2 करोड़ नौकरियां हर वर्ष देेंगे. नौकरियां तो नहीं आईं लेकिन इस वित्तीय वर्ष में बीजेपी की सरकार ने बेरोजगारी दर को 45 सालों में सर्वाधिक कर दिया. 2014 में जब इनकी सरकार बनी थी तब देश की बेरोजगारी दर 4.9 परसेंट थी. आज 8 साल बाद 2022 में बेरोजगारी दर बढ़कर 8 परसेंट पर आ गई है. ये आंकड़ा आर्गेनाइज्ड सेक्टर की बेरोजगारी का है. अनआर्गेनाइज्ड सेक्टर के जॉब लॉस और एमएसएमई के कारखाने कितने बंद हो गए, उसका कोई हिसाब सरकार के पास नहीं है. अभी कुछ ही समय पहले लोकसभा में जवाब देते समय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश को बताया कि कुल 22 करोड़ आवेदन पत्र भारत सरकार के पास नौकरी मांगने के लिए आए. उन 22 करोड़ आवेदनों में से सरकार ने मात्र 7 लाख लोगों को नौकरियां दीं. हम लोग छाती चौड़ी कर कहते हैं कि हम युवा देश हैं, युवाओं का देश है. हमें अपने डेमोग्राफिक डिविडेंड पर गर्व है. भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड बेरोजगारी के तले दबता जा रहा है. सड़कों पर लाठियां खा रहा है और भारत सरकार डेमोग्राफिक डिविडेंड को डेमोग्राफिक डिजास्टर में तब्दील करती जा रही है. इस सरकार ने देश के युवाओं को घर पर बैठाने का काम किया. इसका नारा बदलके हो गया है – हर घर बेरोजगार, यही आज की भाजपा सरकार.
अर्थ व्यवस्था को भी लग गया रोग
दूसरी बड़ी बीमारी जो इस देश की अर्थ व्यवस्था को लगी है, उसकी तरफ सदन का ध्यान चाहूंगा. दूसरी बड़ी असर इन्फ्लेशन, महंगाई इन्फ्लेशन को कहा जाता है. इन्फ्लेशन इज टेक्सेशन विदाउट लेजिस्लेशन, वो महंगाई जो सरकार कानून लाए बिना जनता पर थोप देती है. आज भारत की महंगाई इस वित्तीय वर्ष में 30 साल में सर्वाधिक है. भारत की थोक महंगाई दर 12 से 15 प्रतिशत के आसपास घूम रही है और खुदरा महंगाई 6 से 8 प्रतिशत के बीच घूम रही है. सरकार ने वादा किया था आय बढ़ाने का, आय तो बढ़ी नहीं महंगाई बढ़ रही है. बढ़ती महंगाई और घटती कमाई के चलते आज देश को आधार कार्ड की नहीं उधार कार्ड की जरुरत पड़ रही है. ये सरकार गरीबों को और गरीब कर रही है. गरीब सिर्फ वह नहीं जो सड़क पर कटोरा लेकर भीख मांग रहे. लोग गरीब इसलिए भी हो रहे हैं कि हमारी आमदनी नहीं बढ़ रही है, पर महंगाई बढ़ती जा रही है. एक शख्स जो 20 हजार रुपए महीना कमाता था और 18 हजार खर्च करता था वो महीने का 2 हजार बचाता था. आज उसकी आमदनी 20 हजार है लेकिन खर्चा 18 हजार से बढ़कर 25 हजार हो गया है. यानी कि 20 हजार की आमदनी, 25 हजार का खर्च 5 हजार के नुकसान का कर्ज देश का एक-एक आदमी भुगत रहा है.
जब 2014 में मोदी सरकार बनी थी तो पेट्रोल 55 रुपए लीटर बिकता था. आज पेट्रोल 100 रुपए लीटर बिक रहा है. जो डीजल 45 रुपए लीटर था वो आज 90 रुपए लीटर बिक रहा है. एक गैस का सिलेंडर तब 4 सौ रुपए का मिलता था, आज वो 11 सौ रुपए हो गया है. दूध एक लीटर 36 रुपए का मिलता था, आज 60 रुपए लीटर हो गया है. सीएनजी 40 रुपए प्रति यूनिट किलो थी, वो आज 80 रुपए प्रति यूनिट हो गई है. प्याज सौ रुपए किलो के ऊपर हो गया है. जब सदन में इस पर हंगामा हुआ था तो वित्त मंत्री ने कहा था कि मैं प्याज नहीं खाती. लेकिन मुझे विश्वास है कि वित्त मंत्री आटा, चावल, दूध, दही और पनीर तो अवश्य खाती होंगी, क्योंकि इन सबके भाव बढ़ गए हैं. जीएसटी लगाकर इन्होंने देश का नॉन एक्सपोर्ट इन्फ्लेशन बिगाड़ दिया है. आटा, दाल, चावल दूध, दही, सबके रेट आसमान छू रहे हैं. भारत की फूड इनफ्लेशन 10 प्रतिशत से लेकर 17 प्रतिशत के बीच पूरे वित्तीय वर्ष में मंडरती रही है.
केद्र सरकार ने अमीरों को और अमीर और गरीबों को और गरीब करने का काम किया. परकैपिटा इनकम किसी भी देश के आर्थिक स्वास्थ्य का एक बड़ा इंडिकेटर होता है. भारत की परकैपिटा इनकम वित्तीय वर्ष 20-21 में 9 हजार 160 रुपए गिर गई. यानी की हर व्यक्ति की औसत कमाई को 9 हजार 160 रुपए गिराने का काम इस सरकार ने किया. मतलब आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया.
तीसरी बड़ी बीमारी जो सरकार ने देश को दी है वो है- आर्थिक सुधार का झांसा. इस वित्तीय वर्ष के पहले क्वार्टर में भारत की आर्थिक विकास दर 13.5 प्रतिशत थी. दूसरा क्वार्टर आते आते, जिसे फेस्टिवल क्वार्टर कहते हैं, जिसमें बड़े-बड़े त्योहार आते हैं और जिसमें खपत बढ़ जाती है उत्पादन बढ़ता है, मांग भी बढ़ जाती है. इस फेस्टिवल क्वार्टर में आर्थिक विकास दर 13.5 परसेंट क्वार्टर वन के मुकाबले गिरकर 6.3 पर आ गई. यानी कि आधा हो गई और अगर आप पिछले साल के दूसरे तिमाही से कंपेयर करें तो 2021 में 8.4 प्रतिशत दूसरी तिमाही की ग्रोथ थी. और इस बार इस क्वार्टर में, जो अभी समाप्त हुआ 6.3 प्रतिशत है. यानी भारत की आर्थिक विकास दर निरंतर घटती जा रही है. बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि जब वित्त मंत्री फरवरी में 23-24 का बजट पेश करेंगी तब देश की चौथी तिमाही की आर्थिक विकास दर 5 प्रतिशत से भी कम होगी. ये भारत की इकोनामिक ग्रोथ की हालत है. ये वर्ष जो बीत गया सो बीत गया, अगले साल के आर्थिक विकास दर के आंकड़े सुनिए. सरकार चाहती है हम 8 प्रतिशत पर आगे बढ़ें. वर्ल्ड बैंक का अनुमान है हम 23-24 में मात्र 6 प्रतिशत पर ग्रो करेंगे. यानी देश की अर्थ व्यवस्था हमें ऊपर जाने की बजाए नीचे ले जा रही है.
किसकी जेब में गया कर्ज का 85 लाख करोड़
चौथी बीमारी जो देश की अर्थ व्यवस्था को लगी है वो है ‘द डेट क्राइसिस’. 1947 से लेकर 2014 तक के 67 वर्षों में कई सरकारें रहीं, कई पार्टियों ने शासन किया. इन 67 सालों ने तमाम पार्टियों की सरकारों ने मिलकर कुल 55 लाख करोड़ का कर्ज लिया था. बीते 8 साल में बीजेपी सरकार ने 85 लाख करोड़ का कर्ज लिया. मैं पूछना चाहता हूं मोदी सरकार तो मुफ्त की रेवड़ी भी नहीं बांटती तो फिर इनका कर्ज इतना ज्यादा कैसे हो गया? ये पैसा आखिर जा कहां रहा है? दोस्तवाद की नीति के तहत कौन से दोस्त हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाया जा रहा है. 2014 में जब भाजपा की सरकार बनी तब गवर्नमेंट ‘डेट टू जीडीपी रेशियो’ 40 प्रतिशत था और आज 90 प्रतिशत है. देश ने कुल एक लाख 85 हजार करोड़ का कर्ज लिया है.
उद्योगपतियों का कर्जा माफ, अन्नदाता बेहाल
पांचवीं बीमारी जो देश की अर्थ व्यवस्था को लगी है वह है किसानों का संकट. बड़े-बड़े उद्योगपितयों के अपने दोस्तों के बड़े-बड़े लोन इनने माफ किए हैं, लेकिन किसान को जो कर्ज था वो पिछले 8 सालों में 53 प्रतिशत बढ़ा है न कि कम हुआ है. आज 74 हजार का कर्जा देश के हर किसान पर है. किसान अगर अपने कर्ज का भुगतान नहीं करता तो उसके घर पर नोटिस चिपकाकर सरकार उसे बदनाम करती है. ये सरकार और बड़े उद्योगपति, जो करोड़ों रुपए डकार गए और हमारे देश का अन्नदाता जो हमारा पेट भरता है, आज जहर खाने मजबूर है. एनसीआरबी का डेटा बताता है कि वित्तीय वर्ष 21-22 में 10,851 किसानों ने आत्महत्या की. यानी औसत 30 किसानों ने प्रतिदिन आत्महत्या की. किसान भोला है, भुलक्कड़ नहीं. उसे याद है कि उसे एक साल तक सड़कों पर आंदोलन के लिए उतारा गया था, जिसमें 800 से ज्यादा किसानों की शहादत हुई. किसानों की आय दुगनी करने का वादा सरकार ने किया था. आय दुगनी तो छोड़ दीजिए, 4 से ज्यादा राज्यों में 30 प्रतिशत घट गई. यानी शहरों के मुकाबले गांवों में रहना मुश्किल हो गया है.
कारपोरेट टैक्स कम करने का नहीं मिला लाभ
भारत की अर्थ व्यवस्था को लगी जो छठवीं बीमारी है वो है प्राइवेट सेक्टर इन्वेस्टमेंट में गिरावट. दो बड़े फायदे सरकार ने कारपोरेट जगत को दिए. पहला कारपोरेट टैक्स कम करके 30 प्रतिशत कर दिया. जिसमें 1.5 लाख करोड़ का फायदा कारपोरेट को हुआ और सरकार ने नुकसान उठाया. दूसरा फायदा अपने दोस्त उद्योगपतियों के पिछले 5 वित्तीय वर्षों में 10 लाख करोड़ माफ कर दिए. जब सरकार से पूछा गया कि आपने ये फायदे क्यों दिया तब सरकार कहती है कि इससे रोजगार उत्पन्न होगा. रोजगार तो उत्पन्न नहीं हुआ उल्टा बेरोजगारी दर बढ़ गई. सरकार ने कहा वस्तुएं सस्ती होंगी, जो नहीं हुई, महंगाई बढ़ गई. तीसरा फायदा प्राइवेट निवेश बढ़ेगा, जो घटा है. जब मार्केट मांग होगी तब उत्पादन बढ़ेगा खपत बढ़ेगी.
रुपया भी गिरा और निर्यात भी
भारत की अर्थ व्यवस्था को लगी सातवीं बीमारी है गिरता हुआ रुपया. 2014 में एक डालर 60 रुपए था, आज 82 रुपया है. कई दिगगज कहते थे रुपया गिरता है तो भारत की शाख गिरती है, प्रतिष्ठा गिरती है, जो आज न्यूनतम स्तर पर आ गया है. जब रुपया गिरता है तो भारत का एक्सपोर्ट बढ़ता है क्योंकि पहले जो सामान विदेश 5 डालर पर खरीदता था, आज उसे 3.5 डालर में मिल जा रहा है. आज रुपया के साथ एक्सपोर्ट भी गिर रहा है. बात करें अक्टूबर 2022 की तो 16.7 एक्सपोर्ट गिरा है, यानी रुपया भी गिर गया और एक्सपोर्ट भी धड़ाम.
स्टार्टअप नेशन का फंडा फेल
आठवीं बीमारी स्टार्टअप नेशन है. क्या कभी वित्त मंत्री ने भारत की स्टार्टअप नेशन देखी. भारत में 10 प्रतिशत कम स्टार्टअप अपनी 5 वीं सालगिरह पूरी कर पाते हैं. 3 लाख 25 हजार 757 रूपये भाजपा सरकार ने मांगे हैं, इसमें 1 लाख करोड़ सब्सिडी है. इस दुनिया में 40 देश ऐसे हैं, जो मुफ्त बिजली, शिक्षा, पानी देते हैं. वो इसलिए नहीं देते कि वे विकसित हैं. उन्होंने ये सारी चीजें ह्यूमन रिर्सोसेस पर इन्वेस्ट किया इसलिए वे विकसित हैं.
कौन हैं सांसद राघव चड्ढा
राघव चड्ढा राज्यसभा में सबसे कम उम्र के सांसद हैं. वर्ष 2012 में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए और 2020 में पहली बार दिल्ली के राजिंदर नगर से विधायक चुने गए. फिलहाल वे पंजाब से निर्विरोध राज्यसभा सदस्य चुने गए हैं. पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट श्री चड्ढा ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की. उन्हें एक तेज तर्रार नेता और वक्ता के रूप में जाना जाता है. बजट अनुदान पर 19 दिसम्बर को हुई चर्चा में उन्होंने बिन्दुवार सरकार के बखिए उधेड़ दिये. उनके इस वक्तव्य की आज देश दुनिया में चर्चा हो रही है.
