अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : महिलाओं की सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह कब तक ?
रायपुर- कुछ दिनों पूर्व राजधानी के दैनिक समाचार पत्र में लिखित शीर्षक “राजधानी में रात में घर जाने के लिए डर के साथ चलना पड़ता है. हालांकि यह आलेख पब्लिक ट्रांसपोर्ट से संबंधित था परंतु जो पंक्तियां शीर्षक के रूप में लिखी गई थी वह महिला / स्त्रीलिंग के मामले में शत प्रतिशत सही थी. महिला होने के नाते मेरे द्वारा और हर महिला ने चाहे वह बाल्यावस्था, तरुणावस्था, प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था हो अनजाने एवं अनचाहे डर का अनुभव शाम को अंधेरा होने के पश्चात अकेले आने जाने के समय जिंदगी में एक या अनेक बार झेल कर इस खतरनाक शारीरिक एवं मानसिक स्थिति के अनुभव से गुजर चुके हैं.
महिलाएं शिक्षा, नौकरी एवं विविध कार्य क्षेत्र में अपने परिवार के लिए आय का साधन जुटाती हैं जिससे उसे बहुत बार घर आने जाने में देर हो जाती है. अकेले घर आने – जाने तक उसे उपरोक्त स्थिति का सामना करना पड़ता है. हर वक्त यह डर लगा रहता है कि कहीं हमारे साथ अत्याचार ना हो जाए. हम कहीं गलती से कोई विकट परिस्थिति में ना फंस जाएं.
विश्व स्तर पर हमने AI के युग में प्रवेश कर लिया है महिलाओं की सुरक्षा हेतु कानून व्यवस्था, सरकार द्वारा बनाई गई नीति जिसका पालन भी कड़ाई से हो रहा है फिर भी न केवल बाहर की दुनिया बल्कि घर में भी सुरक्षित क्यों नहीं है? यह एक चिंता का विषय है. हम सुरक्षिता के मामले में क्यों पिछड़ रहे हैं? इनका कारण स्त्री और पुरूष दोनों को मिलकर निकालना चाहिए.
लगभग 30 वर्ष पूर्व एक मराठी फिल्म आई थी जिसका शीर्षक हिंदी रूपांतरण करें तो “सात के भीतर घर में’ होता है क्या यह समय सीमा है या मर्यादा है? अंधेरे के पश्चात बेटी घर नहीं पहुंचती तो परिवार वालों के भीतर अनजाने डर की आशंका के कारण चिंता हो जाती है क्यों? फिर कारण है असुरक्षितता एवं आए दिन होने वाली अत्याचार की दुर्घटनाएं जो दिलों दिमाग पर छा चुकी है जिसे शिकार महिला एवं परिवार वाले जिंदगी भर जूझते रहते हैं.
आज भी कई परिवारों में महिलाओं को नौकरी या घर के बाहर जाकर काम करने की इजाजत नहीं दी जाती. शादी करने पर भी जोर दिया जाता है कारण रूढ़िवादी परंपरा है और कहीं पर सुरक्षा का सवाल वे भी गलत नहीं है जो हालात समाज में दिखाई दे रहे हैं उस पर उनकी राय है पर यह भी सच है महिलाएं आधार स्तंभ हैं. एक शिक्षित समाज का, उन्नत देश का तो उन्हें भी पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में कार्य करना ही पड़ेगा तभी हम प्रगत देशवासी कहलाएंगे.
उक्त माहौल के तारतम्य में महिलाओं एवं नागरिकों द्वारा शासन की नीति द्वारा हम महिला सुरक्षा में कुछ उपाय का अवलंब कर ही सकते हैं जिसके परिणाम भी हमें देखने को मिलेंगे. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में स्वतंत्रता संग्राम से लेकर राष्ट्रपति एवं अंतरिक्ष यात्री तक सभी क्षेत्रों में महिलाओं की बहुत बड़ी भागीदारी है.
मेट्रो शहरों की बात करें कॉर्पोरेट कॉल सेंटर में कार्यरत महिलाओं की शिफ्टिंग ड्यूटी होती है उनके लिए Pick एवं Drop गाड़ियों की सुविधा होती है कंपनियों के द्वारा दी गई बस, टैक्सी की सुविधा बहुत मायने रखती है. स्वास्थ्य विभाग एक आपातकालीन सेवा है जिसमें डॉक्टर, नर्स, हेल्थ केयर वर्कर्स को कोई भी समय अपनी सेवाएं हॉस्पिटल में प्रदान करनी होती हैं इसके लिए भी रात के आवागमन हेतु सुरक्षित वाहन व्यवस्था होनी चाहिए कुछ हॉस्पिटल में यह सुविधा उपलब्ध है.
हर माता-पिता के द्वारा अपने बच्चों को विशेष कर बेटियों को सेल्फ डिफेंस जूडो, कराटे एवं ताइक्वांडो जैसे हुनर सीखने के लिए ट्रेनिंग भेजना चाहिए, साथ ही सेल्फ कॉन्फिडेंस का भी डेवलपमेंट करना चाहिए, जिससे निडर होकर कोई भी परिस्थिति में लड़ सके. महिलाओं द्वारा अकेले प्रवास करने में आजकल पेपर स्प्रे का प्रयोग, तीक्ष्ण वस्तुओं को साथ रखना साथ में अकेले ट्रैवलिंग में मोबाइल ऐप का लोकेशन ऑन रखना, लोकेशन ऐप को अपने परिजनों को भेजना ताकि वे मॉनिटरिंग कर सके. ओला, उबर जैसे एप का प्रयोग करते समय ड्राइवर एवं लोकेशन की जानकारी परिजनों को देना. मोबाइल को ऑन रखकर बातें करना इन कुछ उपाय को सुरक्षितता की दृष्टि से किया जाता है.
पुलिस द्वारा भी सुरक्षितता के लिए पुलिस पेट्रोलिंग जगह-जगह पर रात में तैनात रहती है. महिलाओं के लिए मुख्य हेल्पलाइन नंबर 181 (टोल फ्री) जो कानूनी मदद आपातकालीन सहायता एवं परामर्श प्रदान करती है. इसके अतिरिक्त पुलिस सहायता के लिए 1091 (महिला हेल्पलाइन) और 112 (आपातकालीन पुलिस सेवा) का उपयोग किया जा सकता है. रोड पर सीसीटीवी कैमरा संचालित होना भी महिलाओं की सुरक्षितता में अहम है.
केंद्र शासन द्वारा सराहनीय लिंग संवेदीकरण (Gender sensitization) कार्यक्रम की विविध शिक्षण संस्थानों में ट्रेनिंग, वर्कशाप, सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है. इस कार्यक्रम का उद्देश्य लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता बढ़ाना, पूर्वाग्रहों को खत्म करना. लिंग आधारित भेदभाव एवं हिंसा को रोकने के लिए पुरुषों एवं महिलाओं दोनों को संवेदनशील बनाना जिससे पुरुष एवं स्त्री एक दूसरे का सम्मान कर एक न्यायपूर्ण और सम्मानजनक वातावरण के लिए तैयार हो सके यह कार्यक्रम रूढ़िवादिता को तोड़कर सशक्तिकरण, सहायक व्यवहार, समान अधिकार और अवसर प्रदान करता है जिससे एक सुरक्षित समाज की नींव बने और एक सुरक्षित माहौल महिलाओं को मिल सके.
आखिर में यही कहना चाहूंगी कि नारी स्वयं शक्ति है स्त्री सजन और सृजन दोनों है हर महिला को अपने बच्चों को अच्छे संस्कार, लिंग समानता का महत्व समझाएं ताकि वह सभी महिलाओं को सम्मान से देख सके. उसे सुरक्षा प्रदान करने की हर संभव कोशिश करें. जिससे महिलाएं मुस्कुराते हुए निर्भयता एवं सुरक्षित माहौल पर अपना दायित्व निभाने के लिए हमेशा तैयार रहें.

लेखक- डॉ. सरोज परहाते प्रोफेसर शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय रायपुर ( छ. ग.)
