भर्ती नहीं, बंदरबांट! हाईकोर्ट ने उजागर किया 2011 का इंजीनियरिंग घोटाला, 67 इंजीनियरों की नियुक्ति रद्द
बिलासपुर- छत्तीसगढ़ में सरकारी भर्तियों की पारदर्शिता पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा में वर्ष 2011 में की गई उप अभियंता भर्ती को हाईकोर्ट ने अवैध करार देते हुए 67 नियुक्तियों को रद्द कर दिया है. कोर्ट के इस फैसले ने यह उजागर कर दिया कि कैसे नियमों को ताक पर रखकर वर्षों तक “सिस्टम के भीतर खेल” चलता रहा.
हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि भर्ती प्रक्रिया वैधानिक नियमों के विपरीत थी, इसके बावजूद संबंधित विभाग, चयन एजेंसी और जिम्मेदार अफसरों ने आंख मूंदकर नियुक्तियां कर दीं. सवाल यह है कि जब विज्ञापन केवल 275 पदों के लिए था, तो उससे अधिक पदों पर नियुक्तियां किसके आदेश पर की गईं?
कोर्ट की टिप्पणी ने सत्ता और प्रशासन दोनों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. न्यायालय ने माना कि कई अभ्यर्थियों के पास कट-ऑफ तिथि तक आवश्यक शैक्षणिक योग्यता ही नहीं थी, फिर भी उन्हें नौकरी दे दी गई. यह लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित अनियमितता की ओर इशारा करता है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 14 वर्षों तक ये नियुक्तियां कैसे वैध बनी रहीं? यदि भर्ती अवैध थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या राजनीतिक संरक्षण और अफसरशाही की मिलीभगत के बिना यह संभव था?
नियुक्त उप अभियंताओं की ओर से दी गई “लंबी सेवा” की दलील को हाईकोर्ट ने सख्ती से खारिज करते हुए कहा कि अवैध नियुक्ति सहानुभूति के सहारे वैध नहीं बन सकती. कोर्ट के इस रुख ने सरकार के उस तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है, जिसने वर्षों तक नियमों के उल्लंघन को नजरअंदाज किया.
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल कर्मचारियों पर गाज गिरेगी या फिर उन अधिकारियों और राजनीतिक आकाओं पर भी कार्रवाई होगी, जिन्होंने इस भर्ती प्रक्रिया को अंजाम दिया? विपक्ष ने पहले ही इस मामले को “भर्ती घोटाला” करार देते हुए स्वतंत्र जांच की मांग तेज कर दी है.
