कब तक रौंदे जायेंगे पत्रकार शासन के दमनकारी बुलडोजर नीतियों के नीचे…?

अशोक ठाकुर, सरगुजा- दोस्तों जिस हर्फ को बिखरना था खुशबुओं की तरह,न जाने कैसे खो गए सियासत की फिजाओं में ..
मैं कोई शायर नहीं लेकिन सियासत का गंदा खेल और सियासत दारो के गूंगे बहरे पस्तदारो के गंदी सियासत ने मुझे यह शेर लिखने पर मजबूर कर दिया. मैं चाहता तो दुष्यंत कुमार जी की जीवंत शेर यह भी लिख सकता था ,
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो. कमल के फूल मुरझाने लगे हैं ..
पर क्या करें छत्तीसगढ़ के सियासत का हाल यह है कि कमल की डंडी को कुछ हाथ थामे हुए हैं. मेरा मानना यह है कि आज जितने भी पत्रकार हित की बात करने वाले संगठनों की दुकान चल रही है और कुछ तथा कथित लोग चला रहे हैं. मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि सभी लोग गलत है लेकिन हां इसमें 95 फ़ीसदी लोग तो शासन के शरणागत है और 5 फ़ीसदी लोग अपनी बात पर जमे हुए अड़े हुए हैं.
अभी चंद दिनों की बात है सरगुजा जिले से प्रकाशित होने वाली एक निष्पक्ष निर्भीक पत्रकारिता को आयाम तक पहुंचने वाली एक दैनिक समाचार पत्र घटती घटना के ऑफिस व वहां से लगे हुए एक इमारत पर शासन के इशारे पर प्रशासन ने कुचक्र रचकर जो दमनात्मक कार्यवाही करते हुए सच की आवाज को दबा देने का कुचक्र रचा वह किसी से छुपा नहीं है.
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का आलम यह था दैनिक समाचार घटती घटना के संपादक अविनाश सिंह को कुछ दिनों पूर्व पितृशोक हुआ, हिंदू धर्म के रीतिरिवाजो के अनुसार जब तक 13वीं का कार्यक्रम ना हो तब तक घर के लोग किसी तरह के कोई कार्यक्रम मे शामिल नही होते व घर में भोजन तक नहीं बनाया जाता. इस अवसर का गलत फायदा उठाकर शासन के षड्यंत्रकारी सत्ता के मद में मदान्ध एक सत्ताधारी ने अपने रसूख का परचम लहराते हुए जो तोड़फोड़ की कार्रवाई कर अपनी कुमानसिकता का परिचय दिया जो की निश्चित तौर पर नींदनिय नहीं अतिनिंदनीय कृत्य नहीं अक्षम्य अपराध है. इस बात की खबर क्या मीडिया जगत को नहीं थी? अगर थी तो कोई मजबूरी थी.
यार …..
यही मजबूरी एक दिन तुम्हें उस गर्त पर धकेल देगी जहां से आप कितने भी चीखोगे चिल्लाओगे वहां कोई तुम्हारी आवाज सुनने वाला तक ना होगा.
क्या यह तथा कथित नेताओं जो कि मीडिया के संचालन व पत्रकारों की हित की बात करते हैं इन संगठनों को इस कार्यवाही की खबर नहीं थी? क्या उनके कानों में पिछले शीशे भर दिए गए थे ?क्या सत्ताधीशों ने प्रशासन की आंखों में बिहार वाला गंगाजल डाल दिया था? अब मैं क्या कहूं और मीडिया जगत की दलाली करने वालों से मैं यह निवेदन करना चाहता हूं दलालों पत्रकारिता छोड़ दो या फिर पत्रकारिता छोड़ दो वरना तुम्हारा हश्र भी वही होगा जिसकी तुम आज तक कल्पना नहीं किया और आने वाली नस्लों की रूह कब जाएगी. जागो अब तो जागो भागना नहीं जागना जरूरी है.
