रायपुर के माना स्थित SOS Children’s Village में एक 14 साल की किशोरी से लगातार बलात्कार किया जाता है. इसके चलते वह गर्भवती हो जाती है. महीनों टाल-मटोल के बाद पुलिस रिपोर्ट दर्ज करती है. किशोरी के बयान पर एक कर्मचारी की गिरफ्तारी भी होती है. समय आने पर किशोरी एक मृत शिशु को जन्म देती है. मृत शिशु का डीएनए आरोपित से मैच नहीं करता और हंगामा खड़ा हो जाता है. बाल आयोग की अध्यक्ष और महिला एवं बाल विकास अधिकारी कहती हैं कि उन्हें मामले की भनक तक नहीं है. POCSO Act के प्रावधान धरे के धरे रह जाते हैं.

SOS विलेज में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. देश में 32 ठिकानों पर चल रहे SOS Village से इस तरह की खबरें पहले भी आती रही हैं पर इसके अंतरराष्ट्रीय रुतबे के आगे सरकारी मशीनरी घुटने टेकती रही है. भारत में 32 गांव बसा चुकी एसओएस चिल्ड्रंस विलेज की केन्द्र में मजबूत पकड़ है. इन गांवों में 7000 से ज्यादा अनाथ और परित्यक्त बच्चों की परवरिश हो रही है. इन पर कोई नियंत्रण रखना या इनके कामकाज में दखल देना तो दूर प्रशासन यहां झांकने तक नहीं जाता. यहां पल रही बच्चियां अधिकारियों से लेकर रसूखदारों की हवस का शिकार होती हैं. कई बार मामलों का खुलासा भी हुआ है पर संस्थान की साख को कभी कोई आंच नहीं आई.
SOS Children’s Village का जन्म आस्ट्रिया में हुआ. 1949 में स्थापित इस संस्था ने जल्द ही पूरी दुनिया में अपने पांव पसार लिये. 1964 में यह भारत पहुंचा. इसकी पहली शाखा दिल्ली के पास फरीदाबाद में खुली. आज देश में इसकी 32 शाखाएं हैं जिसमें 7000 से ज्यादा बच्चों की परवरिश की जा रही है. संस्था का दावा है कि वह अब तक 25000 से अधिक बच्चों की परवरिश कर चुकी है. यहां अबोध शिशुओं से लेकर 24 साल तक के युवाओं को रखा जाता है. अधिकांश एसओएस गांव ग्रामीण अथवा शहरी झुग्गी झोंपड़ी इलाके में संचालित हैं. एसओएस विलेजेस का जाल आज दुनिया के 134 देशों तक पसरा हुआ है.

यह है आश्रम का सेटअप
एक SOS गांव में 10 से 15 आवास होते हैं. प्रत्येक आवास में औसतन 10 बच्चे होते हैं. यहां एक उपमाता बच्चों की देखभाल करती है. बच्चों के भोजन, चिकित्सा एवं शिक्षा की यहां व्यवस्था की जाती है. किशोरावस्था में पहुंचने के बाद उनका कौशल विकास किया जाता है और फिर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराकर विदा कर कर दिया जाता है. अनाथ बच्चों को न केवल यहां मां का प्यार मिलता है बल्कि अन्य अनाथ या परित्यक्त बच्चों के रूप में भाई-बहन भी मिलते हैं.
माना बालाश्रम में यौन शोषण
खबरों के मुताबिक माना स्थित SOS Children’s Village की रहवासी एक किशोरी का यौन शोषण होता है. मामला आश्रम में दबा रह जाता है. नवम्बर 2021 में पुलिस मामला दर्ज करती है और किशोरी का बयान दर्ज करती है. आश्रम के एक कर्मचारी को गिरफ्तार भी किया जाता है. समय आने पर किशोरी एक मृत शिशु को जन्म देती है. मृत शिशु का डीएऩए गिरफ्तार कर्मचारी से मेल नहीं खाता और मामला उलझ जाता है. इतना तो साफ हो ही जाता है कि किशोरी का यौन शोषण करने वालों की संख्या एक से अधिक है.
कटघरे में सभी जिम्मेदार
किशोरी की उपमाता को यौन शोषण के इस सिलसिले की भनक तक नहीं लगती. POCSO एक्ट के प्रावधान धरे के धरे रह जाते हैं. पुलिस उपमाता का बयान तक दर्ज नहीं करती. इस बीच उपमाता का चुपचाप फरीदाबाद तबादला कर दिया जाता है. बाल आयोग और महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं. यहां तक की ब्रेकिंग न्यूज की होड़ में लगी मीडिया तक का मुंह बंद रहता है. एफआईआर दर्ज होने के बाद भी उसे कानो-कान खबर नहीं होती. क्या इतने सारे संयोग एक साथ हो सकते हैं. जाहिर है इन सभी का मुंह बंद किया गया है.
अफसरों ने किया घाल-मेल
बच्ची के यौन शोषण और उसके गर्भवती होने की खबर अफसरों ने लीक नहीं होने दी. आश्रम के किसी अफसर या जिम्मेदार पर इस मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. सभी अपने पदों पर बने हुए हैं. किसी के खिलाफ जांच का आदेश तक नहीं हुआ. इस मामले में आश्रम की डायरेक्टर निपुना सेन से संपर्क करने का प्रयास किया गया मगर उन्होंने जवाब नहीं दिया.
काली करतूतों की फेहरिस्त
घटना -1
नवम्बर 2013 में इसी तरह का एक मामला मध्यप्रदेश के फतेहगढ़ में सामने आया था. फरवरी 2014 में बालक अधिकार संरक्षण आयोग ने मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि इसमें नियम कायदों को ताक पर रखा गया. किशोरी के साथ बलात्कार होने की भनक आश्रम वासियों कोतब लगी जब उसका गर्भ 8 सप्ताह का हो गया. मामले में बाल कल्याण समिति ने एसओएस विलेज के मौखिक निवेदन पर ही बच्ची के गर्भपात (MTP) के निर्देश दे दिये. कोई मेडिकल रिपोर्ट तक नहीं लिया गया. आयोग ने इसे गंभीर अनियमितता माना था. इससे SOS Children’s Village की पहुंच और प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है.
घटना-2
दो साल पहले ओडीशा के राउरकेला स्थित एसओएस विलेज से एक 13 साल की किशोरी लापता हो गई. छेंड थाने में किशोरी के लापता होने की प्राथमिकी दर्ज कराई गई. इस किशोरी से कथित रूप से बीरमित्रपुर थाने में पुलिस कर्मियों ने चार महीने तक रेप किया था. घटना के बाद किशोरी गर्भवती हो गई थी जिसका जबरदस्ती गर्भपात करा दिया गया था. मामला खुलने के बाद आईआईसी बीरमित्रपुर को निलंबित कर दिया गया था. बीरमित्रपुर सीएचसी के एक चिकित्सक पर अवैध ढंग से गर्भपात कराने का आरोप लगा था.
घटना-3
सितम्बर 2014 में ऐसा ही एक मामला पटियाला के राजपुरा एसओएस विलेज में सामने आया. यहां एक पूर्व आश्रमवासी ने एक 16 साल की लड़की के साथ बलात्कार किया था. मामले ने दिलचस्प मोड़ तब ले लिया जब लड़की ने बाद में शिकायत वापस लेते हुए मेडिकल जांच से भी इंकार कर दिया. मामले में आरोप लगा कि लड़की को घटना के बाद भी आश्रम में ही रखा गया था जहां दबावपूर्वक उसका बयान बदल दिया गया. इस मामले में भी पुलिस ने शिकायत के दो माह बाद प्राथमिकी दर्ज की थी.
घटना-4
भारत ही नहीं विदेशों में भी एसओएस विलेज का दबदबा साफ दिखाई देता है. लाइबेरिया में एसओएस विलेज के नेशनल डायरेक्टर को एक बच्ची के आरोप से यह कहकर बरी कर दिया जाता है कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं. यह घटना इसी साल सितम्बर की है. घटना के दौरान 16 साल की यह लड़की ब्यूकानन स्थित एसओएस सेफ होम में रह रही थी.
घटना-5
अगस्त 2018 में असम के गुवाहाटी स्थित SOS Children’s Village के एक वरिष्ठ अधिकारी को गिरफ्तार किया गया. उसपर आश्रम की तीन किशोरियों के साथ यौन दुराचार का आरोप था. इस एसओएस गांव में 140 बच्चे रहते हैं. 44 वर्षीय आरोपी इस परियोजना का सहायक निदेशक था. उसने किशोरियों के साथ तब यौन छेड़छाड़ की जब वह उनके साथ कार से सफर कर रहा था. किशोरियों की शिकायत को पहले तो किसी ने गंभीरता से नहीं लिया पर जब मामला मीडिया में आया तब जाकर कार्रवाई की गई.
– “केस की फिर से पूरी तरह से जांच कराएंगे, जो भी जिम्मेदार होगा, दोषी होगा उसपर कार्रवाई करेंगे. यह रेप नहीं, गैंगरेप का मामला है. अफसरों की भूमिका और गड़बड़ी के तथ्य मिलेंगे तो उनपर भी कार्रवाई करेंगे. बड़ी गलती हुई है, बच्ची के साथ जो हुआ गंभीर मामला है, आगे ऐसा न हो सतर्क रहना होगा.”
- अनिला भेड़िया, महिला एवं बाल विकास मंत्री
–“ये मामला गंभीर है. हम इस इस पूरी घटना की जानकारी लेंगे और कार्रवाई करेंगे. SP और कलेक्टर से इस केस पर बात करेंगे. तथ्य मंगवाए जाएंगे, और नियमानुसार एक्शन लेंगे. बाल आयोग बच्चों के लिए ही है, बच्ची के साथ न्याय हो यही हमारा प्रयास होगा. बच्चों के लिए ही हम जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, इस प्रकरण को देखा जा रहा है.”
- तेजकुंवर नेताम, अध्यक्ष, बाल आयोग
–“घटना से भी अधिक दुर्भाग्य जनक है महिला एवं बाल विकास विभाग अधिकारियों द्वारा मामले की लीपापोती करना. अधिकारी कुछ कहते हैं, पुलिस कुछ और कहती है और जांच रिपोर्ट में कुछ और ही सामने आता है. पीड़िता अब भी वहीं जहां उसके साथ दुष्कर्म हुआ था. उससे दबावपूर्ण बयान दिलवाए जाते हैं. इस घटना ने कांग्रेस राज में बेटियों और महतारियों के प्रति कार्यप्रणाली की पोल खोल दी है.”
- रमशीला साहू, पूर्व महिला बाल विकास मंत्री
