चुनाव के मद्देनजर गढ़े गए सभी मुद्दे
न तो छत्तीसगढ़ में रोहिंग्या का वास
न ही साम्प्रदायिक फसाद
पीएससी में घोटाले को सबूत नहीं
छत्तीसगढ़ आजतक : सत्ता गंवाने के बाद से निठल्ली बैठी भाजपा में कुछ ही महीने पहले प्राण लौटे हैं. वह राज्य के भिन्न-भिन्न हिस्सों में अलग-अलग भ्रम फैला कर जनता को भरमाने की कोशिश कर रही है. जितना बड़ा झूठ वह कांग्रेस राज में धर्मांतरण को सरकारी संरक्षण को लेकर बोल रही है, लगभग उसी स्तर का झूठ वह रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर भी बोल रही है. जिन घटनाओं के साम्प्रदायिक होने का भाजपा दावा कर रही है, वो भी आपसी झगड़े से ही जुड़े हुए हैं. इसमें किसी भी समाज की कोई भूमिका नहीं थी. इन मामलों को लेकर स्वयं केन्द्रीय गृहमंत्री झूठ बोल गए.
भाजपा ने कवर्धा में रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने का आरोप भूपेश सरकार पर लगाया है. यहां गन्ने की खेती और गुड़ बनाने के कारोबार से जुड़े अधिकांश परिवार मुसलमान हैं. पर ये कोई बांग्लादेश से भगाए गए रोहिंग्या नहीं हैं बल्कि पिछले लगभग ढाई दशक से यहां बसे हुए हैं. इन सभी का मूल राज्य उत्तर प्रदेश है. गन्ने की खेती और गुड़ बनाने के कौशल के चलते वे रोजगार की तलाश में यहां आ बसे हैं. वैसे भी छत्तीसगढ़ एक भू-बद्ध (लैंड लॉक्ड) राज्य है. छत्तीसगढ़ की कोई भी सीमा अंतरराष्ट्रीय सीमा से नहीं मिलती. रोहिंग्या मुसलमानों को अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रोकना केन्द्र की जिम्मेदारी है. रोहिंग्या मुसलमानों को कई राज्य पार करके छत्तीसगढ़ आना होगा. इनमें से अधिकांश में भाजपा की सरकारें हैं.
एक ऐसा ही आरोप भाजपा बस्तर में धर्मांतरण को लेकर लगाती है. बस्तर में ईसाइयों की गतिविधियां पिछले कई दशकों से जारी है. इसमें अभूतपूर्व तेजी तब आई जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी. आंकड़े बताते हैं कि रमन सरकार के 15 सालों में सबसे ज्यादा धर्मांतरण हुए और नए चर्चों की स्थापना हुई. पर कभी भी आदिवासी समुदाय और ईसाइयों के बीच टकराहट नहीं हुई. भाजपा की सरकार जाते ही आदिवासियों ने ईसाइयों का जबरदस्त विरोध शुरू कर दिया. उन्हें अपने मृतकों के शव दफनाने के लिए स्थान देने से इंकार कर दिया. कहा गया कि इससे आदिवासियों के देवताओं की शक्ती क्षीण होती है. इन हिंसक झड़पों में दोनों ही तरफ आदिवासी थे. यह आग क्यों और किसके द्वारा लगाई गई, इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. कहीं ऐसा न हो कि बस्तर और सरगुजा दूसरा मणिपुर न बन जाए. वैसे यह मुद्दा जनमानस में घर कर गया है. देखना यह है कि इसमें भाजपा को कितना फायदा मिलेगा.
जब सफेद झूठ बोल गए गृहमंत्री
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साजा प्रत्याशी के नामांकन रैली में शामिल होने के बाद यहां भ्रम फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अव्वल तो लोगों की समझ में यही नहीं आया कि गृहमंत्री ने बिरनपुर के ईश्वर साहू को इतना महत्व क्यों दिया कि उनके नामांकन रैली में शामिल हुए. ईश्वर साहू कोई स्थापित राजनेता नहीं है. उनके पुत्र की कुछ समय पहले आपसी विवाद में कुछ युवकों ने हत्या कर दी थी. गृह मंत्री ने आरोप लगाया कि सरकार आरोपियों को संरक्षण दे रही है. जबकि हकीकत यह है कि बिरनपुर हादसे के बाद राज्य शासन ने अपनी पूरी ताकत यहां झोंक दी थी. न केवल आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया था बल्कि यहां किसी भी तरह के उपद्रव को रोकने में भी सरकार सफल रही थी. दरअसल साजा से ईश्वर साहू और कवर्धा से विजय शर्मा को प्रत्याशी बनाया ही इसलिए गया है कि यहां भाजपा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का फायदा ले सके. कांग्रेस ने शाह पर राज्य का साम्प्रदायिक माहौल खराब करने और धार्मिक उन्माद पैदा करने का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग से शिकायत भी की है.
भाजपा प्रत्येक ऐसे मामले को साम्प्रदायिक बताने की कोशिश करती रही है जिसमें एक पक्ष में कोई अल्पसंख्यक हो. जबकि हकीकत यही है कि ये हमले किसी कौम पर नहीं बल्कि व्यक्तिविशेष पर हुए. इससे पहले दुर्ग भिलाई में मूर्ति खंडित करने की कुछ घटनाओं को भी साम्प्रदायिक बताने की कोशिश की गई पर जब असामाजिक तत्वों को जिम्मेदार पाया गया तो भाजपा का मुंह बंद हो गया. इसी तरह खुर्सीपार में मलकीत सिंह की हत्या को भी साम्प्रदायिक मुद्दा बनाने की कोशिश की गई पर जैसी ही वास्तविकता सामने आई, भाजपा को सांप सूंघ गया.
पीएससी घोटाले की यह है हकीकत
आईएएस को तिलांजलि देकर शिक्षक का पेशा अपनाने वाले मोटिवेशनल गुरू विकास दिव्यकीर्ति की मानें तो छत्तीसगढ़ एवं झारखंड की पीएससी परीक्षा है. दिव्यकीर्ति यूपीएससी की कोचिंग चलाते हैं. विगत 4-5 सालों में सीजी पीएससी में चयनित होने वाले अधिकांश अभ्यर्थी छत्तीसगढ़ के निवासी हैं. इनमें भी एससी, एसटी और ओबीसी की संख्या ज्यादा है. भाजपा के पेटदर्द का यही कारण है. छत्तीसगढ़ में पीएससी लिखित परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं को इंटरनेट पर डाल दिया जाता है जिसकी जांच कोई भी कर सकता है. साक्षात्कार की व्यवस्था भी ऐसी है कि ये तक पता नहीं होता कि किस अभ्यर्थी का साक्षात्कार कौन लेगा. प्राप्तांकों की सूची पर हस्ताक्षर करने से पहले कोई भी साक्षात्कार लेने वाला कमरे से बाहर नहीं निकल सकता.
भाजपा के आरोपों की पड़ताल में पता चला कि पीएससी चेयरमेन टामन सिंह सोनवानी के एकमात्र रिश्तेदार का ही चयन पीएससी में हुआ है. अफवाह फैलाई गई कि पांच रिश्तेदार का चयन हुआ है. कहा यह भी गया कि सोनवानी को इसी गड़बड़ी के चलते हटाया गया है. सच्चाई यह है कि सोनवानी ने अपना कार्यकाल पूर्ण होने पर अवकाश प्राप्त किया है. जिन उम्मीदवारों का चयन हुआ वे सभी यूपीएससी की कोचिंग करने के साथ ही पिछले 7-8 सालों से लगातार परीक्षा दे रहे हैं. पिछले पांच साल में किसी भी मंत्री या विधायक के रिश्तेदार का चयन पीएससी में नहीं हुआ. भाजपा केवल राजनीतिक लाभ के लिए भ्रम फैला रही है. अपनी मेहनत से यह परीक्षा पास करने वालों की मेहनत का उपहास कर रही है. यह मुद्दा भी जनमानस में चर्चा का विषय है. देखना यह लाजिमी होगा कि भाजपा को चुनाव में कहां तक सफलता मिलती है.
धर्मांतरण का ईलाज
सनातन धर्म के वर्ण व्यवस्था तथा जाति व्यवस्था के चलते धर्मांतरण होता है. भारत के नागरिक खासकर पिछड़ी जाति के लोग सामाजिक दायरे में बंधे हुए हैं. जो जाति से बाहर नहीं आना चाहते, वे लोग भला क्यों धर्म परिवर्तन करने में मजबूर हो जाते हैं? इसका मूल कारण जाति व्यवस्था में छूआछूत का होना तथा आर्थिक रूप से कमजोर होना. राहुल गांधी ने घोषणा किया कि केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनने पर तुरंत जाति जनगणना तथा आर्थिक सर्वेक्षण करायी जावेगी. निश्चित ही जाति गणना से सरकार में पिछड़ी जाति का भागीदारी का मार्ग प्रशस्त होगा एवं आर्थिक सर्वेक्षण करने पर यदि सरकार आर्थिक रूप से पिछड़ों को ध्यान में रखकर योजना बनायी जाती है तो धर्मांतरण पर रोक लग सकती है.
