राजनीतिक हत्या करने की साजिश
दोनों दलों में हैं उनके घोर विरोधी
जमीनी नेतृत्व खत्म करने की कोशिश
सहकारी क्षेत्र को बड़ा झटका
छत्तीसगढ़ आजतक : विधानसभा चुनाव के पूर्व ही छत्तीसगढ़ में चुनावी बिसात बिछ चुकी है. सत्ता पक्ष कांग्रेस के चुनावी चालों से भाजपा के दो महत्वपूर्ण विकेट उखड़ चुके हैं. पहला भाजपा के कद्दावर आदिवासी नेता नंद कुमार साय का कांग्रेस प्रवेश. दूसरा भाजपा में ओबीसी वर्ग के बड़े नेता सहकारिता पुरूष प्रीतपाल बेलचंदन की गिरफ्तारी. इससे भाजपा के आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक को करारा झटका लगा है. पढ़िए छत्तीसगढ़ आजतक की एक रिपोर्ट…..

भ्रष्टाचार और गवन के मामले में प्रीतपाल बेलचंदन की ऐन विधानसभा चुनाव से पूर्व हुई गिरफ्तारी को राजनीतिक पंडित एक गहरी साजिश मानते हैं. ऐसे लोगों का कहना है कि प्रीतपाल दुर्ग संभाग में भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही कुछ नेताओं की आंखों की किरकिरी बन चुके थे. सहकारिता और बैंक से जुड़े होने के कारण प्रीतपाल की किसानों के बीच अच्छी पेठ है. इसके अलावा वे उस कुर्मी समाज का भी प्रतिनिधित्व करते है जिसकी यहाँ के अनेक विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका होती है, सबसे बड़ी बात यह कि वे उस वेलचदन परिवार से आते हैं जिसने छत्तीसगढ़ में सहकारी कृषि की नींव रखी.
प्रीतपाल बेलचंदन को लगभग 15 करोड़ रुपए के घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. उनपर आरोप है कि उन्होंने अपने पद और प्रभाव का उपयोग करते हुए 234 किसानों को 13 करोड़ से अधिक के ऋण बांट दिये, इनमें से 186 प्रकरणों में उन्होंने एकमुश्त समझौता राशि वसूलकर उन्हें अनुचित लाभ पहुंचाया. आरोप हैं कि ऋण एवं अनुदान में 14.89 करोड़ रुपए का कुल घोटाला किया गया. बताते चलें कि यह मामला 2021 का है जब पुलिस ने बैंक के सीईओ पंकज सोढ़ी की शिकायत पर एफआईआर दर्ज किया था. प्रीतपाल ने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका लगाई थी जिसे निरस्त कर गिरफ्तारी के आदेश दिये गये, इसके बाद उनकी गिरफ्तारी हो गई.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रीतपाल की गिरफ्तारी काफी पहले हो सकती थी पर इसे जानबूझकर टाला गया. ऐन चुनाव से पहले गिरफ्तारी से ऐसे जानकारों को राजनीतिक द्वेष की बू आती है. उनका मानना है कि दरअसल प्रीतपाल बेलचंदन उन महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए एक चुनौती बन चुके थे जिनकी कोई जमीनी पकड़ नहीं है. ऐसे लोग न केवल कांग्रेस में बल्कि भाजपा में भी हैं. दोनों ही दलों के लोग प्रीतपाल के बढ़ते राजनीतिक कद से आशंकित थे. इस डर का वाजिब कारण भी है. प्रीतपाल की विरासत और बढ़ता कद प्रीतपाल बेलचंदन उसी बेलचंदन परिवार से हैं जिसे इस अंचल की कृषि को सहकारिता से जोड़ने का श्रेय जाता है. उनके चाचा प्यारेलाल बेलचंदन ग्राम तिरंगा झोला के एक समृद्ध किसान थे. गांधी वादी नेता प्यारेलालजी खेरथा और धमधा से विधायक रहे. अप्रैल 2023 में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने खरखरा मोहन्दीपाट परियोजना का नामकरण इस परियोजना के जनक प्यारेलाल बेलचंदन के नाम पर कर दिया. साथ ही बेलचंदन जी की प्रतिमा का अनावरण भी किया. उनके भतीजे प्रीतपाल भी सहकारिता और किसानों की सेवा के इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.
वर्तमान में वे प्रदेश के सहकारिता क्षेत्र का सबसे बड़ा चेहरा हैं. खेती-किसानी को उद्यमिता बनाने की दिशा में “सबको” नामक संस्था का गठन कर वे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में प्रयत्नशील रहे. भाजपा सरकार ने वर्ष 2014 में उन्हें जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित, दुर्ग का अध्यक्ष बनाया जिसपर वे लंबे समय तक बने रहे. उन्होंने जिला सहकारी बैंक दुर्ग को नई ऊंचाई दी. गांव-गांव में सहकारी संस्थाओं को आगे बढ़ाया. उन्होंने पूर्व विधायक वासुदेव चन्द्राकर के सहकारी मिशन को भी आगे बढ़ाने का काम किया. वे कृषि उपज मंडी दुर्ग के निर्वाचित सदस्य भी थे.
इसलिए वे राजनीतिक रंजिश का शिकार हुए. उनकी गिरफ्तारी से किसानों और सहकारिता की जड़े कमजोर हुई हैं, इससे किसानों और सहकारी क्षेत्र के पैरोकारों की आवाज कमजोर होगी. प्रीतपाल का भाजपा में जाना धुर कांग्रेसी परिवार से होते हुए भी प्रीतपाल को, अपनी ही पार्टी में हुई उपेक्षा के चलते भाजपा का दामन थामना पड़ा. प्रीतपाल न केवल किसानों के बीच लोकप्रिय हैं बल्कि वे उस कुर्मी समाज का भी प्रतिनिधित्व करते हैं जिनकी इस संभाग के सभी चुनावों में निर्णायक भूमिका होता है. भाजपा ने उन्हें 2008 में विधानसभा चुनाव में उतारा पर वे कुछ मतों से पराजित हो गए. सम्प्रति प्रीतपाल डोंगरगांव विधानसभा के भाजपा प्रभारी हैं. दुर्ग, बालोद और बेमेतरा क्षेत्र में किसानों के बीच इनकी मजबूत पकड़ है और वे आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं.
चेहरा बिगाड़ने की कोशिश
अपने बढ़ते कद और लोकप्रियता के कारण प्रीतपाल भाजपा के महत्वाकांक्षी नेताओं का सिरदर्द तो थे ही वे वर्तमान कांग्रेस सरकार की छवि में ज्यादा फिट बैठते हैं. छत्तीसगढ़ सरकार का चेहरा छत्तीसगढ़ियावाद का है. वह राज्य की अस्मिता, प्रतिष्ठा और गरिमा को लेकर काम कर रही है, किसानों के बीच भी सरकार की अच्छी छवि है. भाजपा से प्रीतपाल बेलचंदन की भी यही छवि थी. कांग्रेस के कुछ नेताओं को भी यह बात खटक रही थी. इसलिए उनकी छवि को बिगाड़ना जरूरी हो गया था. इसका बड़ा कारण यह भी था कि भाजपा प्रीतपाल को दुर्ग जिले के किसी विधानसभा से प्रत्याशी बना सकती थी जो कांग्रेस के लिए परेशानी का कारण बन सकता था.
हाशिए पर लाने की कोशिश
प्रीतपाल को हाशिए पर लाने की कोशिशें बहुत पहले शुरू हो चुकी थीं. 2021 में बैंक घोटाले की खबर आने के बाद संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाएं दुर्ग संभाग ने प्रीतपाल बेलचंदन को सेवा सहकारी समिति मर्यादित तिरंगा की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया था. इसके बाद जिला सहकारी केंद्रीय बैंक दुर्ग के करीब 15 साल तक अध्यक्ष रहे प्रीतपाल बेलचंदन अब सहकारिता चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. बेलचंदन तिरगा की समिति से ही प्रतिनिधि चुनकर बैंक के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होते रहे हैं.
हट गया रास्ते का कांटा
प्रीतपाल बेलचंदन की किसानों के बीच और सहकारी क्षेत्रों में मजबूत पकड़ है. उन्हें जमीनी स्तर पर लोग जानते थे और उनसे जुड़े हुए थे. दुर्ग ग्रामीण विस क्षेत्र में कुर्मी समाज की निर्णायक भूमिका होती है. प्रीतपाल की गिरफ्तारी से सीधे-सीधे सत्तारूढ़ दल को फायदा होगा. ऐसा राजनीतिक पंडितों का कहना है. उनकी गिरफ्तारी से दुर्ग ग्रामीण के विधायक ताम्रध्वज साहू के रास्ते का कांटा हट गया है. इसका लाभ भाजपा सांसद सरोज पांडे गुट को भी मिलेगा. दुर्ग ग्रामीण सीट पर प्रीतपाल की दावेदारी उनके राजनीतिक समीकरणों को बिगाड़ सकती थी. उनकी गिरफ्तारी को आमजन एवं कृषक वर्ग राजनैतिक द्वेष का प्रतिफल मानता है. उनके प्रति उमड़ती सहानुभूति उन नेताओं के लिए महंगी भी पड़ सकती है जो उनकी गिरफ्तारी में खुद को राहत महसूस कर रहे हैं. बेलचंदन पिछले करीब 23 वर्षों से भाजपा में सक्रिय हैं. वर्ष 1997 में वे पहली बार बैंक के संचालक मंडल में चुनकर आए. 2004 में पुनर्गठन समिति के अध्यक्ष भी बने. वर्ष 2008 से वे लगातार जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष थे. पिछले जिला पंचायत चुनाव में उन्होंने अपनी पत्नी मोक्ष बेलचंदन को भाजपा की अधिकृत प्रत्याशी माया बेलचंदन के खिलाफ मैदान में उतारा था.
