मानव सभ्यता के विकास की कहानी पीढ़ियों के एकांतरण के जैविक सिद्धांत की पुष्टि करती है. दुनिया में चर्चित प्रेम कहानियों में कालीदास रचित दुष्यंत- शकुन्तला और अत्यंत चर्चित हीर-रांझा, लैला-मजनू, रोमियो जूलियट, सलीम अनारकली, शाहजहाँ- मुमताज के किस्से तो सबने सुने होंगे, किन्तु आज छत्तीसगढ़ में स्थित एक अनूठे प्रेम की निशानी जिसका जिक्र न तो भारतीय सिनेमा में हुआ है और न ही किसी कलमकार ने उसे अपनी लेखनी से विश्व पटल पर लाने का कार्य किया है.

छ.ग. आजतक ब्यूरो–
छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले में महानदी के तट पर स्थित ऐसे रमणीक स्थल को सर्वप्रथम सेन्ट्रल प्रोविन्स एंड बरार के राजस्व आयुक्त ने 14 नवंबर 1906 के राजपत्र में पुरातात्विक महत्व के क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया और पता लगा कि वहाँ भी मोहन जोदड़ो एवं हड़प्पा, मेसोपोटामिया की तरह एक प्राचीन मानव सभ्यता के अवशेष लंबित हैं. उसके बाद से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई से मानव सभ्यता के अनेक रहस्य उजागर होने के साथ ही अब भी तीन चौथाई रहस्य अनसुलझे ही हैं. अब तक उजागर रहस्यों में सिरपुर क्षेत्र में छठवीं शताब्दी की एक अनूठी प्रेम कहानी का सबूत सामने आया है और वह प्रेम की निशानी है सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर.
लक्ष्मण मंदिर सिरपुर को अनूठा कहने का कारण है कि यह अन्य प्रेम कहानियों की तरह प्रेमियों के व्दारा अपनी प्रेयसी के लिए किये गये प्रेम के प्रदर्शन की कहानी न होकर इकलौती गाथा है जिसमें प्रेयसी ने अपने प्रेमी की याद में इसका निर्माण कराया था. कहते हैं तत्कालीन दक्षिण कौशल के राजा सोमवंश के राजा हर्षगुप्त का विवाह मगध नरेश सूर्यवर्मा की पुत्री राजकुमारी वसाटादेवी से हुआ था और उनके दो पुत्र रामेश्वर एवं लक्ष्मणेश्वर थे. हर्षगुप्त शैव मत के थे जबकि वसाटा वैष्णव मत की. दोनों में अगाध प्रेम था और हर्षवर्धन की मृत्यु ने वसाटा के मन में असहनीय वेदना भर दी थी जिसके निवारण के लिए दोनों के प्रेम से उत्पन्न पुत्रों के नाम पर उसने हर्षवर्धन की याद को चिरस्थायी बनाने के लिए क्रमशः राम और लक्ष्मण मंदिरों का निर्माण कराया था,
जो 12 शताब्दी के भूकंप और 14 वीं, 15वीं शताब्दी में महानदी के विनाशकारी बाढ़ में जमींदोज हो गये थे किन्तु वसाटा देवी के अक्षुण्ण प्रेम की यह निशानी लक्ष्मण मंदिर पुरात्त्व विभाग की 20वीं सदी के अंत में की गई खुदाई में 1500 सालों के बाद भी पूरी तरह सही सलामत प्राप्त हुई है. इस मंदिर का निर्माण सन् 525 से 540 के मध्य हुआ है. नागर शैली में, दुनिया के इकलौते लाल ईंटों से बने लक्ष्मण मंदिर को एक हिन्दू मंदिर के साथ ही नारी के मौन प्रेम की अद्भुत निशानी के रुप में भी जाना जाता है. यदि प्रेम को प्रदर्शित करने वाले 500 साल पुराने ताजमहल को, जिसे कि विदेशों से लाये संगमरमर के पत्थों को तराशकर श्वेत शीतल प्रेम की निशानी माना जा सकता है तो सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर प्रेम की तपन को दर्शाने वाले लाल ईंटों से बना एवं 1500 सालों से टिका मजबूत और गहरे प्रेम का प्रतीक है. इतिहास में इसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती बल्कि यह सबसे पुराने प्रेम की निशानी के तौर पर एक वास्तविकता है.
लाल ईंटों से बना यह मंदिर अद्भुत इसलिए भी है कि ईंटों पर नक्काशी का दूसरा नमूना दुनिया में कोई और नहीं है, जहां पत्थरों पर भी ऐसी नक्काशी देखने को मिलती हो. लक्ष्मण मंदिर में एक गर्भगृह, अंतराल और मंडप भी हैं साथ ही मंदिर का तोरण और उसमें शेष शैय्या पर लेटे हुए भगवान विष्णु और उनके नाभि से ब्रम्हाजी के उद्भव को बेहद करीने से उकेरा गया है साथ ही भगवान विष्णु के चरणों में माता लक्ष्मी विराजमान है. मंदिर के भीतर भगवान विष्णु के दशावतारों को चित्रित किया गया है. गर्भगृह में पाँच फन वाले शेषनाग पर विराजमान लक्ष्मण की प्रतिमा स्थापित है.
